El Nino 2026: रिकॉर्ड ताकत वाली घटना से भारत के मानसून और दुनिया के मौसम पर बड़ा असर, 2027 तक दिख सकते हैं बदलाव
प्रशांत महासागर में बन रहा मजबूत एल नीनो 2026 दुनिया के मौसम को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। इसका असर भारत के मानसून खेती पानी और तापमान पर पड़ सकता है। 2027 तक इसके प्रभाव कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकते हैं।

In Short
- मजबूत एल नीनो से भारत के मानसून पर असर पड़ने की आशंका बढ़ी
- नीनो 3.4 तापमान 2015-16 के 2.75 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड को पार कर सकता है
- दुनिया के कई हिस्सों में सूखा बाढ़ गर्मी और तूफानों का खतरा बढ़ सकता है
El Nino 2026: प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ता तापमान पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित कर सकता है। साल 2026 में बन रहा एल नीनो आने वाले समय में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका असर तापमान, बारिश और कई देशों के मौसम के पैटर्न पर देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना भारत के मानसून और खेती के लिए भी अहम साबित हो सकती है।
क्या है एल नीनो और कैसे करता है काम
एल नीनो एक प्राकृतिक मौसम पैटर्न है, जो एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन यानी ईएनएसओ का गर्म चरण होता है। इसमें प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है। ईएनएसओ के तीन चरण होते हैं एल नीनो ला नीना और न्यूट्रल स्थिति।
आमतौर पर भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में ट्रेड विंड्स यानी व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। ये गर्म पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ ले जाती हैं। वहीं दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आता है जिसे अपवेलिंग कहा जाता है। यही प्रक्रिया समुद्री जीवन और मछलियों के लिए जरूरी पोषक तत्व पहुंचाती है।
कैसे बनता है मजबूत एल नीनो
एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर की ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं और कई बार उनकी दिशा भी बदल सकती है। इससे गर्म पानी पूर्व की ओर दक्षिण अमेरिका के पास पहुंचने लगता है। वहीं समुद्र की गहराई से ठंडे पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है।
इस बदलाव से पश्चिमी और पूर्वी प्रशांत महासागर के तापमान का अंतर कम होने लगता है। इसके बाद वातावरण में दबाव का बदलाव हवाओं को और कमजोर करता है और एल नीनो की ताकत बढ़ने लगती है।
भारत के मानसून पर क्यों पड़ता है असर
भारत के लिए एल नीनो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध गर्मियों के मानसून से माना जाता है। मजबूत एल नीनो साल की शुरुआत में ज्यादा गर्मी बढ़ा सकता है और बाद में मानसून को कमजोर करने की स्थिति बना सकता है।
इसका असर खेती पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि एल नीनो का असर हर बार एक जैसा नहीं होता क्योंकि भारत के मानसून को प्रभावित करने वाले कई दूसरे वायुमंडलीय और समुद्री कारक भी होते हैं।
दुनिया के अलग अलग हिस्सों में दिख सकता है असर
एल नीनो का प्रभाव हर क्षेत्र में अलग हो सकता है। दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में ज्यादा गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ सकता है जबकि दक्षिणी ब्राजील मध्य चिली और उत्तरी अर्जेंटीना में ज्यादा बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
दक्षिण पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखा जंगलों में आग और कम बारिश का खतरा बढ़ सकता है। दक्षिणी अफ्रीका में दिसंबर से फरवरी के दौरान सूखे की स्थिति बन सकती है जबकि पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
उत्तरी अमेरिका में एल नीनो से उत्तर पश्चिमी कनाडा और अमेरिका में सर्दियां सामान्य से हल्की हो सकती हैं जबकि दक्षिणी अमेरिका और कैलिफोर्निया में तूफान और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
उष्णकटिबंधीय तूफानों पर भी असर
एल नीनो समुद्री तूफानों के बनने और उनकी दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। अटलांटिक और कैरेबियन क्षेत्र में यह तूफानों की संख्या कम कर सकता है क्योंकि इससे वर्टिकल विंड शियर बढ़ जाता है।
वहीं पश्चिमी प्रशांत महासागर में गर्म पानी के पूर्व की ओर खिसकने से तूफान बनने की जगह बदल सकती है। इससे फिलीपींस की ओर जाने वाले तूफानों की संभावना कम हो सकती है लेकिन चीन जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों पर असर बढ़ सकता है।
एल नीनो से क्यों बढ़ता है वैश्विक तापमान
एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर में जमा गर्मी बड़ी मात्रा में वातावरण में पहुंचती है। वैज्ञानिकों के अनुसार नीनो 3.4 क्षेत्र के तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस बदलाव से वैश्विक औसत तापमान में करीब 0.1 डिग्री सेल्सियस तक बदलाव देखा जा सकता है और इसका असर तीन से छह महीने की देरी से दिख सकता है।
1998 2016 और 2024 जैसे कई बेहद गर्म साल बड़े एल नीनो घटनाओं के साथ जुड़े रहे हैं। हालांकि एल नीनो लंबे समय तक बढ़ रहे ग्लोबल वार्मिंग का कारण नहीं है। यह सिर्फ थोड़े समय के लिए तापमान को ऊपर ले जाता है जबकि लंबे समय की गर्मी बढ़ने की मुख्य वजह ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना है।
2026-27 को सुपर एल नीनो क्यों कहा जा रहा है
सुपर एल नीनो कोई आधिकारिक वैज्ञानिक नाम नहीं है। इसका इस्तेमाल इसलिए किया जा रहा है क्योंकि मौजूदा एल नीनो के बहुत मजबूत होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
मौसम मॉडल के अनुसार नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान का अंतर 2.75 डिग्री सेल्सियस के पुराने रिकॉर्ड को पार कर सकता है। यह रिकॉर्ड 2015-16 के एल नीनो के दौरान बना था।अगर अनुमान सही साबित होते हैं तो 2026 और 2027 में यह घटना दुनिया के तापमान और मौसम के पैटर्न पर बड़ा असर डाल सकती है।