Claude AI ने खोजा CRISPR जैसा नया सिस्टम, जीन एडिटिंग की दुनिया में मिल सकती है बड़ी कामयाबी

AI अब वैज्ञानिक खोजों में भी नई भूमिका निभा रहा है। Anthropic के Claude AI मॉडल ने बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस में एक नए सिस्टम की पहचान की है, जो CRISPR तकनीक जैसा दिखता है। कंपनी के मुताबिक, यह खोज जीन एडिटिंग के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है, हालांकि इसकी उपयोगिता साबित करने के लिए आगे लैब टेस्ट जरूरी हैं।

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Claude ने नए एंजाइम सिस्टम की खोज की। (फोटो: www.anthropic.com)
Claude ने नए एंजाइम सिस्टम की खोज की। (फोटो: www.anthropic.com)

In Short

  • Anthropic के Claude AI मॉडल ने वायरस में CRISPR जैसा नया बायोलॉजिकल सिस्टम खोजने का दावा किया है।
  • AI ने 2 लाख से ज्यादा रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम की जांच कर संभावित सिस्टम की पहचान की।
  • वैज्ञानिक अब यह पता लगाएंगे कि क्या यह सिस्टम भविष्य में जीन एडिटिंग में इस्तेमाल हो सकता है।

By Shakshi:

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब वैज्ञानिक खोजों में भी मदद कर रहा है। AI कंपनी Anthropic ने दावा किया है कि उसके Claude AI मॉडल ने एक नया बायोलॉजिकल सिस्टम खोजा है, जो जीन एडिटिंग में इस्तेमाल होने वाली CRISPR तकनीक जैसा है। यह सिस्टम बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस में मिला है। हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि यह नया सिस्टम असल में क्या काम करता है और इसका इस्तेमाल जीन एडिटिंग में किया जा सकेगा या नहीं।

कंपनी ने 23 सितंबर को अपनी इस खोज की रिपोर्ट प्री-प्रिंट के रूप में जारी की है। इसका मतलब है कि अभी दूसरे वैज्ञानिकों ने इसकी औपचारिक समीक्षा नहीं की है।

Claude AI ने आखिर क्या खोजा?

Claude AI ने जिस नए सिस्टम की पहचान की है, उसका नाम ART है। इसका पूरा नाम Array-Associated Reverse Transcriptase है। इसमें रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज नाम का एक एंजाइम होता है, जो RNA में मौजूद जानकारी को पढ़कर उससे DNA तैयार करता है। कुछ बैक्टीरिया ऐसे एंजाइम का इस्तेमाल वायरस से अपना बचाव करने के लिए करते हैं।

Claude AI को इस एंजाइम के पास DNA का एक खास पैटर्न मिला। इसमें DNA के कुछ हिस्से एक निश्चित दूरी पर बार-बार दोहराए जा रहे थे। ऐसा ही पैटर्न CRISPR सिस्टम में भी देखने को मिलता है।

CRISPR एक ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से वैज्ञानिक DNA के किसी खास हिस्से में बदलाव कर सकते हैं। अब वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ART सिस्टम का इस्तेमाल भी इसी तरह किया जा सकता है।

21 घंटे में 2 लाख से ज्यादा एंजाइम की जांच

Anthropic के मुताबिक, इस खोज के लिए करीब 950 Claude AI एजेंट्स ने मिलकर काम किया। इन एजेंट्स ने सार्वजनिक DNA डेटाबेस में मौजूद 2 लाख से ज्यादा रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम की जांच की।

करीब 21 घंटे तक चली इस प्रक्रिया में AI ने 21 करोड़ टोकन इस्तेमाल किए और आखिर में 20 ऐसे संभावित सिस्टम की पहचान की, जिन पर आगे रिसर्च की जा सकती थी।

इसी दौरान एक AI एजेंट ने DNA में बार-बार दोहराए जाने वाले खास पैटर्न की पहचान की। इसके बाद उसने इन हिस्सों की संख्या और इनके बीच की दूरी की जांच की। साथ ही वैज्ञानिक रिसर्च को भी खंगाला, ताकि पता चल सके कि इस सिस्टम की खोज पहले तो नहीं हो चुकी है।

Anthropic का कहना है कि इस तरह की जांच करने में किसी वैज्ञानिक को कई हफ्ते या महीने लग सकते थे।

क्या AI अब खुद वैज्ञानिक खोज कर सकता है?

इस खोज में Claude AI ने DNA डेटाबेस की जांच की, नए पैटर्न की पहचान की और वैज्ञानिकों को आगे की जांच के लिए सुझाव दिए। हालांकि, लैब में प्रोटीन तैयार करने और उसकी जांच करने का पूरा काम इंसानी वैज्ञानिकों ने किया।

Anthropic के पास अमेरिका के बे एरिया में एक लैब भी है, जहां प्रशिक्षित वैज्ञानिक ऐसे जैविक पदार्थों पर काम करते हैं जो इंसानों को संक्रमित नहीं कर सकते।

CRISPR तकनीक विकसित करने में योगदान देने वाले MIT के वैज्ञानिक फेंग झांग ने भी इस रिसर्च की समीक्षा की है। उन्होंने इस खोज को दिलचस्प बताया और कहा कि इस पर आगे जांच की जरूरत है।

वहीं, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक अलग टीम ने भी इससे जुड़े एक एंजाइम सिस्टम की जानकारी दी है।

जीन एडिटिंग में कैसे काम आ सकती है यह खोज?

वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए अहम हो सकती है क्योंकि CRISPR तकनीक की शुरुआत भी DNA में मिले एक अनोखे पैटर्न से हुई थी। उस समय वैज्ञानिकों को यह पता नहीं था कि आगे चलकर इसका इस्तेमाल जीन एडिटिंग में किया जा सकेगा।

Anthropic की शुरुआती लैब जांच में पता चला है कि ART सिस्टम के पास मौजूद DNA से RNA तैयार हो रहा है। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में इस सिस्टम को भी किसी खास काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि, अभी यह साबित नहीं हुआ है कि ART सिस्टम DNA में बदलाव कर सकता है या इसका इस्तेमाल किसी मेडिकल तकनीक में किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों को अब लैब में इसकी आगे जांच करनी होगी, जिसके बाद ही इसके असली काम और संभावित इस्तेमाल के बारे में पता चल सकेगा।

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