एक क्लिक में शॉपिंग और पेमेंट करना पड़ सकता है भारी? Gen Z की डिजिटल सुरक्षा पर एक्सपर्ट ने बताई जरूरी बातें

आज की युवा पीढ़ी के लिए पेमेंट, शॉपिंग और AI का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन हर क्लिक के साथ आपकी निजी जानकारी कितनी सुरक्षित रहती है? साइबर अपराध के बदलते तरीकों के बीच एक्सपर्ट ने डिजिटल पहचान से जुड़े कुछ ऐसे खतरे बताए हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।

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In Short

  • Gen Z की ऑनलाइन पेमेंट, शॉपिंग और सोशल मीडिया से जुड़ी डिजिटल पहचान पर साइबर ठगी का खतरा।
  • AI के जरिए डीपफेक वीडियो, नकली आवाज और फर्जी पहचान बनाकर धोखाधड़ी की चुनौती बढ़ी।
  • एक्सपर्ट के मुताबिक, डिजिटल सुरक्षा के लिए कंपनियों के साथ यूजर्स की सतर्कता भी जरूरी।

By Gungun Mishra:

युवा पीढ़ी के लिए आज लगभग हर काम फोन से हो रहा है। दोस्तों को पैसे भेजने हों, ऑनलाइन शॉपिंग करनी हो, सोशल मीडिया चलाना हो या एआई से किसी सवाल का जवाब लेना हो, सब कुछ एक टैप में हो जाता है। लेकिन इस सुविधा के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है। क्या हमारी डिजिटल पहचान सुरक्षित है? साइबर ठगी के बदलते तरीकों के बीच एक्सपर्ट ने बताया है कि डिजिटल सुरक्षा के लिए किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है।

एक क्लिक में सुविधा, लेकिन खतरा भी

आज किसी ऐप पर अकाउंट बनाने या ऑनलाइन पेमेंट करने के लिए मोबाइल नंबर, ईमेल, नाम, पता और कई निजी जानकारियां देनी पड़ती हैं। ज्यादातर लोग बिना शर्तें पढ़े ही सहमति दे देते हैं।

अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर साझा की गई यही जानकारी साइबर अपराधियों के निशाने पर आ सकती है। फिशिंग लिंक, फर्जी वेबसाइट, नकली कस्टमर केयर नंबर और ओटीपी फ्रॉड के जरिए लोगों को ठगा जा सकता है। कई बार अपराधी किसी की पहचान का इस्तेमाल करके फर्जी अकाउंट भी बना लेते हैं।

AI ने बढ़ाई साइबर ठगी की मुश्किल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने डिजिटल दुनिया को आसान बनाया है, लेकिन साइबर अपराधी भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

डीपफेक वीडियो, नकली आवाज और फर्जी डिजिटल पहचान के जरिए धोखाधड़ी की जा रही है। अब किसी परिचित की आवाज में फोन करके पैसे मांगना या किसी के चेहरे से नकली वीडियो बनाना आसान हो गया है। ऐसे में सिर्फ पासवर्ड और ओटीपी पर निर्भर रहना काफी नहीं है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

एक्सपर्ट ने बताया कंपनियों की क्या जिम्मेदारी है

लेक्सिस नेक्सिस रिस्क सॉल्यूशंस के निदेशक, वित्तीय अपराध, रोहित मित्तल के मुताबिक, आज उपभोक्ता तेज और आसान डिजिटल सेवाएं चाहते हैं। इसके लिए वे अपनी निजी जानकारी साझा करने को भी तैयार रहते हैं।

उनका कहना है कि इस जानकारी को इकट्ठा करने और संभालने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे इसे सुरक्षित रखें और ग्राहकों का भरोसा बनाए रखें।

मित्तल के मुताबिक, धोखेबाज जनरेटिव एआई की मदद से डीपफेक, कृत्रिम पहचान और दस्तावेजों में हेरफेर जैसी धोखाधड़ी कर रहे हैं। इसलिए कंपनियों को पहचान जांचने के सिर्फ एक तरीके पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

डिजिटल पहचान कैसे रहेगी सुरक्षित?

एक्सपर्ट के मुताबिक, कंपनियों को लेन-देन, डिवाइस की जानकारी और यूजर के व्यवहार जैसे अलग-अलग संकेतों की जांच करनी चाहिए। यह प्रक्रिया सिर्फ अकाउंट बनाते समय नहीं, बल्कि लॉग-इन, पेमेंट और अकाउंट अपडेट करते समय भी जरूरी है।

वहीं, यूजर्स को मजबूत पासवर्ड रखना चाहिए, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन अपनाना चाहिए और अनजान लिंक से बचना चाहिए। ऐप्स को गैरजरूरी अनुमति देने से भी बचना जरूरी है।

जेन जी के लिए डिजिटल दुनिया में सुविधा के साथ अपनी निजी जानकारी की सुरक्षा करना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

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