समंदर के नीचे छिपा खतरा; ऑस्ट्रेलिया के इंटरनेट नेटवर्क पर मंडरा रहा बड़ा संकट

समंदर के नीचे बिछी इंटरनेट केबल में खराबी ने ऑस्ट्रेलिया के डिजिटल नेटवर्क की सुरक्षा पर चिंता बढ़ा दी है। पर्थ के पास दो अंडरसी केबल में फॉल्ट आया है जो देश के 95 प्रतिशत से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक को संभालती हैं। अब नई लेजर तकनीक से सुरक्षा मजबूत करने की तैयारी है।

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In Short

  • ऑस्ट्रेलिया के पर्थ के पास इंडिगो वेस्ट और इंडिगो सेंट्रल अंडरसी केबल में खराबी आई
  • देश का 95 प्रतिशत से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे मौजूद केबल पर निर्भर है
  • डीएएस लेजर तकनीक से केबल के आसपास जहाजों और समुद्री गतिविधियों की निगरानी संभव होगी

By Gaurav Kumar:

ऑस्ट्रेलिया के सामने इंटरनेट कनेक्शन को लेकर एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। समंदर के नीचे बिछी इंटरनेट केबल में हुई खराबी ने देश के डिजिटल नेटवर्क की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया का 95 प्रतिशत से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं अंडरसी केबल के जरिए चलता है, इसलिए इनकी सुरक्षा बेहद जरूरी है।

पर्थ के पास दो अंडरसी केबल में आई खराबी

ऑस्ट्रेलिया के पर्थ के पास समुद्र में मौजूद दो अंडरसी इंटरनेट केबल में खराबी सामने आई है। यह नुकसान पर्थ सबमरीन केबल प्रोटेक्शन जोन के अंदर हुआ है, जिसे समुद्र के नीचे मौजूद केबल को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया था। इस घटना के बाद देश के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।

सबको कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बेवन स्लैटरी ने इसे चिंताजनक घटना बताया है। उन्होंने कहा कि सबमरीन केबल देश की डिजिटल लाइफलाइन हैं और इस मामले की तुरंत जांच होनी चाहिए। उन्होंने इस नुकसान की जांच के लिए फेडरल पुलिस से भी कार्रवाई की मांग की है।

इंडिगो वेस्ट और इंडिगो सेंट्रल केबल हुई प्रभावित

खराब हुई दोनों केबल इंडिगो वेस्ट और इंडिगो सेंट्रल सिस्टम हैं। ये केबल पर्थ को सिडनी जकार्ता और सिंगापुर से जोड़ती हैं। ये ऑस्ट्रेलिया को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले बड़े अंडरसी नेटवर्क का हिस्सा हैं।

ऑस्ट्रेलिया इंटरनेट के लिए इन समुद्री केबल पर काफी निर्भर है। देश से जुड़ी या बनने वाली कुल 22 इंटरनेशनल सबमरीन केबल हैं। ये केबल देश के 95 प्रतिशत से ज्यादा इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक को संभालती हैं। सैटेलाइट कनेक्शन मौजूद हैं लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर के लिए अभी भी फाइबर ऑप्टिक केबल सबसे जरूरी हैं।

कैसे काम करती हैं समुद्र के नीचे बिछी केबल

इन केबल के अंदर कई ऑप्टिकल फाइबर होते हैं। ये कांच की बेहद पतली फाइबर करीब एक इंच के आठवें हिस्से जितनी चौड़ी होती हैं और एक सेकंड में 20 टेराबिट से ज्यादा डेटा भेज सकती हैं।

केबल में लगे ऑप्टिकल एम्प्लीफायर सिग्नल को मजबूत बनाए रखते हैं। ये एम्प्लीफायर हर 50 से 100 किलोमीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं और इन्हें बिजली की जरूरत होती है। यह बिजली ऑप्टिकल फाइबर के साथ लगी धातु की तारों से पहुंचती है।

नुकसान की असली वजह अभी साफ नहीं

इस घटना को शंट फॉल्ट कहा जा रहा है। इसमें समुद्र के नीचे मौजूद केबल का इलेक्ट्रिकल हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे उसकी क्षमता कम हो सकती है या वह पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक समुद्र के नीचे केबल खराब होने की सबसे आम वजह जहाजों के एंकर और मछली पकड़ने वाले जाल होते हैं। हालांकि जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है। लेकिन अभी तक पर्थ केबल खराब होने की असली वजह सामने नहीं आई है।

बेवन स्लैटरी के मुताबिक खराबी का सही कारण तभी पता चलेगा जब मरम्मत के दौरान केबल को समुद्र से बाहर निकाला जाएगा। इसी जांच से यह साफ होगा कि नुकसान कैसे हुआ।

लेजर तकनीक से रोका जा सकता है खतरा

वैज्ञानिक अब डिस्ट्रीब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसिंग यानी डीएएस तकनीक पर काम कर रहे हैं। इसमें लेजर की मदद से फाइबर ऑप्टिक केबल के आसपास होने वाली गतिविधियों को पहचाना जा सकता है।

यह तकनीक केबल के आसपास चल रहे जहाजों समुद्र की सतह में होने वाली हलचल और दूसरी गतिविधियों का पता लगा सकती है। इसके अलावा इससे भूकंप और सुनामी जैसी प्राकृतिक घटनाओं की निगरानी भी की जा सकती है।

बेवन स्लैटरी ने कहा कि अगर खराब हुई केबल में यह तकनीक लगी होती तो संभव है कि नुकसान करने वाले जहाज की पहचान तुरंत हो जाती। आसपास मौजूद कुछ केबल में यह तकनीक पहले से लगी है और वहां किसी तरह की समुद्री गतिविधि दर्ज नहीं हुई है।

इंटरनेट के साथ सुरक्षा सेंसर का भी काम करेंगी केबल

शोधकर्ता अब यह भी जांच रहे हैं कि क्या एक ही फाइबर से इंटरनेट डेटा भेजने के साथ निगरानी का काम भी किया जा सकता है। शुरुआती शोध में सामने आया है कि डीएएस तकनीक और तेज डेटा ट्रांसफर एक साथ काम कर सकते हैं।

इसके अलावा ऑप्टिकल माइक्रोकॉम्ब तकनीक पर भी काम हो रहा है, जिससे निगरानी सिस्टम को छोटा बेहतर और सस्ता बनाया जा सकता है।ऑस्ट्रेलिया जैसे देश के लिए जहां इंटरनेट कनेक्शन कुछ ही अंडरसी केबल पर निर्भर है, ऐसी तकनीक डिजिटल नेटवर्क को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

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