1916 की एक गलती जिसने बदल दी दुनिया; पेन से शुरू हुई थी कंप्यूटर चिप्स की कहानी
साल 1916 में एक वैज्ञानिक की छोटी सी लैब गलती ने ऐसी तकनीक को जन्म दिया जिसने आज की कंप्यूटर चिप इंडस्ट्री को बदल दिया। पेन के पिघली धातु में जाने से शुरू हुई यह खोज आगे चलकर सिलिकॉन क्रिस्टल और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव बनी।
In Short
- 1916 में जान कोच्राल्स्की की पेन और पिघली टिन वाली गलती से शुरू हुई क्रिस्टल बनाने की नई तकनीक
- कोच्राल्स्की मेथड से तैयार सिंगल क्रिस्टल ने सिलिकॉन चिप निर्माण को आसान बनाया
- आज कंप्यूटर स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनाने में इसी तकनीक की अहम भूमिका है
करीब एक सदी पहले हुई एक छोटी सी लैब गलती ने ऐसी तकनीक की नींव रख दी जो आज कंप्यूटर, स्मार्टफोन और हर तरह के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जान है। साल 1916 में एक वैज्ञानिक ने गलती से पेन को स्याही की जगह पिघली हुई धातु में डाल दिया और इसी घटना से एक ऐसी प्रक्रिया की खोज हुई जिसने आगे चलकर आधुनिक चिप बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस खोज की शुरुआत कैसे हुई और यह कंप्यूटर चिप्स तक कैसे पहुंची इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है।
पेन से हुई गलती ने दिखाई नई राह
साल 1916 में पोलैंड के केमिस्ट जान कोच्राल्स्की बर्लिन की एईजी लैब में काम कर रहे थे। वह यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि धातुएं किस तरह क्रिस्टल बनाती हैं। एक मशहूर घटना के अनुसार उन्होंने गलती से अपनी पेन को स्याही की जगह पिघली हुई टिन धातु से भरे बर्तन में डाल दिया।
जब उन्होंने पेन को बाहर निकाला तो उसकी निब से एक पतली धातु की तार जैसी संरचना लटक रही थी। यह सिर्फ जमी हुई धातु नहीं थी बल्कि एक संकेत था कि किसी पदार्थ के परमाणुओं को एक व्यवस्थित तरीके से एक ही दिशा में जोड़ा जा सकता है।
गलती से बनी क्रिस्टल बनाने की नई तकनीक
जान कोच्राल्स्की ने इस घटना पर रिसर्च शुरू की। उन्होंने पाया कि पिघली हुई धातु से किसी वस्तु को कितनी तेजी से बाहर निकाला जाता है इससे बनने वाले क्रिस्टल की गुणवत्ता बदल जाती है।
बाद में उन्होंने पेन की जगह कैपिलरी का इस्तेमाल किया और पिघले हुए पदार्थ से क्रिस्टल खींचने की एक नियंत्रित तकनीक विकसित की। इसी तकनीक को आगे चलकर कोच्राल्स्की मेथड कहा गया।
इस प्रक्रिया में किसी पदार्थ को गर्म करके पिघलाया जाता है और फिर एक छोटे क्रिस्टल बीज को उस पिघले हुए पदार्थ में लगाया जाता है। इसके बाद उसे धीरे धीरे ऊपर खींचा जाता है जिससे उसी दिशा में बड़ा और मजबूत सिंगल क्रिस्टल तैयार होता है।
कंप्यूटर चिप्स में सिलिकॉन की एंट्री
कोच्राल्स्की का शुरुआती काम कंप्यूटर चिप बनाने के लिए नहीं था। वह सिर्फ धातुओं के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया को समझ रहे थे। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स तेजी से आगे बढ़ा और वैज्ञानिकों को ट्रांजिस्टर बनाने के लिए बेहद शुद्ध और बड़े सेमीकंडक्टर क्रिस्टल की जरूरत पड़ी।
यहीं से कोच्राल्स्की मेथड का इस्तेमाल जर्मेनियम और बाद में सिलिकॉन क्रिस्टल बनाने में किया जाने लगा। यह बदलाव इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि चिप बनाने के लिए एक समान और नियंत्रित सामग्री की जरूरत होती है।
पिघले सिलिकॉन से बनती है चिप की नींव
इस प्रक्रिया में सिलिकॉन को पिघलाकर एक बड़ा बेलनाकार सिंगल क्रिस्टल तैयार किया जाता है। इसके बाद इस क्रिस्टल को बेहद पतली डिस्क में काटा जाता है जिसे सिलिकॉन वेफर कहा जाता है।
इन्हीं वेफर की सतह पर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाए जाते हैं और आगे चलकर यही सर्किट कंप्यूटर चिप का रूप लेते हैं।आसान भाषा में समझें तो सफर कुछ ऐसा है।पिघला हुआ सिलिकॉन से सिंगल क्रिस्टल तैयार होता है फिर उससे सिलिकॉन वेफर बनता है और उसी पर छोटे छोटे इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बनाकर चिप तैयार की जाती है।
सिंगल क्रिस्टल इतना जरूरी क्यों है
सिलिकॉन का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स में इसलिए किया जाता है क्योंकि इसकी इलेक्ट्रिकल प्रॉपर्टीज को बहुत सटीक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन अगर क्रिस्टल के अंदर छोटी सी भी गड़बड़ी हो तो चिप बनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सिंगल क्रिस्टल स्ट्रक्चर एक ऐसा साफ और समान आधार देता है जिस पर बेहद छोटे और जटिल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बनाए जा सकते हैं। इसी वजह से कोच्राल्स्की प्रक्रिया से तैयार किए गए क्रिस्टल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री का अहम हिस्सा बन गए।
टिन से शुरू हुई कहानी पहुंची सिलिकॉन की दुनिया तक
जान कोच्राल्स्की ने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी खोज एक दिन माइक्रोप्रोसेसर और आधुनिक तकनीक की नींव बनेगी। वह सिर्फ धातुओं के व्यवहार को समझ रहे थे लेकिन पिघली हुई टिन में डूबा एक पेन एक बड़ी वैज्ञानिक खोज का कारण बन गया।
आज के क्रिस्टल बनाने वाले सिस्टम पहले से कहीं ज्यादा एडवांस हैं। इनमें तापमान, घूमने की गति, क्रिस्टल खींचने की रफ्तार और वातावरण को बेहद सटीक तरीके से नियंत्रित किया जाता है। इन्हीं तकनीकों की मदद से आज बड़े स्तर पर सिलिकॉन क्रिस्टल बनाए जाते हैं जिनसे दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाली कंप्यूटर चिप्स तैयार होती हैं।