चीनी की बढ़ती कीमतों से मांग पर पड़ा असर, व्हाइट शुगर फ्यूचर्स दो हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंचा
व्हाइट शुगर फ्यूचर्स में गिरावट आई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया तेजी के बाद ऊंची कीमतों का असर मांग पर दिखने लगा है। अक्टूबर कॉन्ट्रैक्ट की बड़ी डिलीवरी और भारत से हुई सीमित चीनी डिलीवरी ने बाजार का ध्यान खींचा है।

In Short
- व्हाइट शुगर फ्यूचर्स दो हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंचा, कीमत 517.80 डॉलर प्रति टन तक गिरी।
- अक्टूबर कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी पर करीब 5 लाख टन रिफाइंड शुगर की डिलीवरी हुई।
- भारत में रिकॉर्ड ऊंची घरेलू चीनी कीमतों के बाद आयात की जरूरत पड़ी, सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी।
व्हाइट शुगर फ्यूचर्स में गिरावट दर्ज की गई है। हाल में कीमतों में आई तेजी के बाद अब मांग कमजोर पड़ने के संकेत मिल रहे हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, इसी वजह से व्हाइट शुगर वायदा दो हफ्ते के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
सबसे ज्यादा कारोबार वाले कॉन्ट्रैक्ट में 1.6% तक की गिरावट आई और कीमत 517.80 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। यह स्तर 3 सितंबर के बाद सबसे कम है।
अक्टूबर कॉन्ट्रैक्ट की बड़ी डिलीवरी
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, यह गिरावट अक्टूबर कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी के एक दिन बाद आई। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत करीब 5 लाख टन रिफाइंड शुगर की डिलीवरी हुई, जो इस अवधि में सबसे बड़ी डिलीवरी में से एक रही।
स्टोनएक्स के विश्लेषक रिकार्डो नोगुएरा के अनुसार, खासतौर पर प्रमुख उत्पादक देश थाईलैंड से हुई डिलीवरी से संकेत मिलता है कि स्पॉट मार्केट में प्रीमियम कीमतें वायदा बाजार की तेजी के साथ नहीं बढ़ पाई हैं।
थाईलैंड और भारत की डिलीवरी पर नजर
नोगुएरा के अनुसार, ऐसी स्थिति में एक्सचेंज के जरिए चीनी बेचना ज्यादा फायदेमंद ऑप्शन बन गया है। उन्होंने बताया कि डिलीवरी में थोड़ी मात्रा में भारतीय चीनी भी शामिल थी, जिस पर कारोबारियों की नजर गई।
उन्होंने कहा कि हालांकि भारत से डिलीवर की गई चीनी की मात्रा काफी कम थी, लेकिन इसकी मौजूदगी कुछ हद तक अलग स्थिति दिखाती है। यह भारत सरकार की घरेलू चीनी भंडार को बेहतर तरीके से संतुलित करने की हालिया कोशिशों से मेल नहीं खाती।
भारत में रिकॉर्ड ऊंची कीमतों का असर
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, हाल में सप्लाई में कमी की चिंता के चलते भारत में घरेलू चीनी कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। इसके बाद भारत को चीनी आयात की ओर बढ़ना पड़ा।
चीनी की सप्लाई को लेकर चिंता के कारण अगस्त में वायदा कीमतें 17 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई थीं। इस तेजी का फायदा उठाते हुए उत्पादकों ने हेजिंग बढ़ाई।
अब कीमतों में आई गिरावट से संकेत मिल रहा है कि ऊंची कीमतों का असर मांग पर पड़ने लगा है और बाजार में सप्लाई और मांग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश जारी है।