स्वाभिमानी Ratan Tata को जब चुभी फोर्ड चेयरमेन की बात, तो जानिए उन्होंने क्या किया?
रतन टाटा के निधन से भारतीय उद्योग जगत को गहरा आघात लगा है। पूरे देश में दुख की लहर है। इस बीच रतन टाटा से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है जो काफी वायरल हो रही है। स्वाभिमानी रतन टाटा को जब फोर्ड चेयरमैन की बात चुभ गई थी तो उन्होंने ऐसे लिया था बदला।

भारतीय उद्योग जगत का सबसे शीतल छायादार लोकहितकारी वटवृक्ष रतन टाटा अब अनंत में विलीन हो चुका है। रतन टाटा के निधन से भारतीय उद्योग जगत को गहरा आघात लगा है। क्या आप यकीन करेंगे कि उद्योग जगत की मुलाफावसूली की गलाकाट प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में रतन टाटा जैसा इंसान अपने समूह का 60 फीसदी से ज्यादा मुनाफा परोपकार के कार्यों के लिए दान कर देता था। जी हां जिस दौर में उद्योगपति मुनाफा कमाने के लिए तमाम नैतिक-अनैतिक कामों से परहेज नहीं करते थे उस दौर में रतन टाटा ने टाटा ट्रस्ट की स्थापना कर गरीब, मजलूम जरूरतमंद लोगों की हरचंद मदद का बीड़ा उठाया और शिक्षा, चिकित्सा से लेकर शोध और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अपने समूह के कुल मुनाफा का आधे से ज्यादा हिस्सा लोकहित में लगाने का फैसला किया।
रतन टाटा से जुड़ा खास किस्सा
इन सब के बीच जुड़ी रतन टाटा से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है जो काफी वायरल हो रही है। आइये जानते हैं वो खास किस्सा, जिसने रतन टाटा के एक अलग इमेज सामने लाकर रख दी। संवेदनशील और स्वाभिमानी रतन टाटा को बिल फोर्ड की ये बात बहुत ज्यादा चुभ गई और उन्होंने फोर्ड के साथ डील निरस्त कर दी। वक्त का खेल देखिए कि साल 2008 में जब वैश्विक मंदी ने दस्तक दी तो फोर्ड दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया और तब रतन टाटा ने फोर्ड के दो पोपुलर ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर को 2.3 बिलियन डॉलर में खरीद लिया। दरअसल रतन टाटा के ह्रदय का हर स्पंदन मानवीय संवेदना से प्रेरित था। एक बार जब रतन टाटा ने मुंबई की सड़कों पर तेज बारिश के दौरान एक परिवार के चार लोगों को टू व्हीलर पर भींगते हुए देखा बचपन से ही परोपकार की प्रेरणा से लबरेज रहे रतन टाटा का मन इस दृश्य को देखकर आहत हो गया और उन्होंने लोअर मीडिल क्लास के लिए दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का फैसला किया, उसी दिन रतन टाटा ने अपने इंजीनियर्स को बुलाया और एक लाख रुपये में बजट कार बनाने की प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया। 23 मार्च 2009 को टाटा मोटर्स ने नैनो को लॉन्च किया और इस तरह वो लोग जो टू व्हीलर्स के सपने को जैसे-तैसे पूरा कर पाते थे। कार पर चलने का उनका भी सपना पूरा हो गया।
रतन टाटा की जिंदगी
अजीब इत्तेफाक ये है कि बड़े औद्योगिक घराने के महफूज साए में पैदा होने के बाद भी रतन टाटा बचपन में ही अनाथ कर दिए गए। रतन टाटा जब महज 10 साल के थे तो इनके माता-पिता नवल टाटा और सूनी कमिसारिएट ने अलग होने का फैसला कर लिया और रतन टाटा को जे. एन. पेटिट पारसी अनाथालय में डाल दिया गया। अपने पोते के अनाथ आश्रम में होने की खबर जब रतन टाटा की दादी नवाजबाई टाटा को लगी तो उनका मन कराह उठा और उन्होंने फैसला किया कि उनके रहते उनका पौत्र अनाथ आश्रम में नहीं पलेगा। दादी नवाजबाई रतन को अपने साथ ले आईं और उनका पूरे नाजो से पालन-पोषण किया। हालांकि अनाथ आश्रम में बिताए अपने नामाकूल दिनों की याद रतन टाटा के दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए जज्ब हो गई और जब ईश्वर ने जब उन्हें मौका दिया तो देश के हर जरूरतमंद की मदद के लिए उन्होंने अपने खजाने का मुंह खोल दिया। सचमुच रतन टाटा भारत के एक अनमोल रत्न थे और उनके जाने से ना सिर्फ उद्योग जगत बल्कि सियासत, शिक्षा, धर्म, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है।
रतन टाटा के बड़े कदम
28 दिसंबर 1937 को नवल और सूनू टाटा के घर जन्मे रतन टाटा साल 1962 में बतौर असिस्टेंट टाटा समूह से जुड़े थे। साल 1991 में उन्होंने जेआरडी टाटा से टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन पद का उत्तराधिकार हासिल किया। एक बेमिसाल, संवेदनशील इंसान होने के साथ ही रतन टाटा एक बेहतरीन प्रोफेशनल भी थे।यही वजह है कि टाटा समूह का नेतृत्व हाथ में लेने के बाद समूह का मुनाफा तेजी से बढ़ने लगा।रतन टाटा 1991 से 2012 तक लगातार टाटा समूह के चेयरमैन बने रहे और इन 21 सालों में टाटा ग्रुप का मुनाफा 50 गुना से ज्यादा बढ़ गया। अपने वतन से रतन टाटा को बेपनाह मोहब्बत थी। यही वजह है कि चेयरमैन बनने के सात साल बाद साल 1998 में उन्होंने देश की पहली स्वदेशी कार टाटा इंडिका लॉन्च की, हालांकि शुरुआती कामयाबी नहीं मिलने के कारण एक साल बाद उन्होंने अमेरिका की नामी-गिरामी ऑटोमोबाइल कंपनी फोर्ड को टाटा इंडिका बेचने का फैसला किया। तब फोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन बिल फोर्ड ने रतन टाटा पर तंज कसते हुए कहा कि 'आपने पैसेंजर कार डिवीजन शुरू ही क्यों की जब आपको इस बारे में कोई ज्ञान और अनुभव नहीं था. ये डील करके हम आप पर एहसान ही करेंगे।
आपको बता दें कि रतन टाटा आजीवन अविवाहित रहे। हालांकि उनकी जिंदगी में चार मौके ऐसे आए जब उनकी शादी तय हो गई थी। लेकिन विधाता को शायद ये मंजूर नहीं था। 86 साल की उम्र में आखिरकार इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन समूचा हिन्दुस्तान और इसकी आने वाली पीढ़ियां हमेशा इस महामानव की ऋणि रहेंगी।