India-EU ट्रेड डील: शेयर बाजार की उम्मीदों पर एक्सपर्ट की राय, जानिए किस सेक्टर को होगा फायदा और किसे नुकसान
इस समझौते को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक माइलस्टोन माना जा रहा है, लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि इसके फायदों को लेकर हमें वास्तविकता के करीब रहना होगा।

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए महा-समझौते, जिसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है, ने शेयर बाजार में नई जान फूंक दी है। मंगलवार को इस खबर के आते ही सेंसेक्स और निफ्टी में जोरदार रिकवरी देखी गई। शुरुआती गिरावट के बाद सेंसेक्स करीब 81,540 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, वहीं निफ्टी में भी तेजी दर्ज की गई।
इस समझौते को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक माइलस्टोन माना जा रहा है, लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि इसके फायदों को लेकर हमें वास्तविकता के करीब रहना होगा।
बाजार में राहत, लेकिन उम्मीदों पर ब्रेक जरूरी
श्री रामा मैनेजर्स के को-फाउंडर और फंड मैनेजर अभिषेक बसुमल्लिक का मानना है कि ईयू के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) फायदेमंद तो है, लेकिन निवेशकों को अपनी उम्मीदें थोड़ी काबू में रखनी चाहिए। उनका कहना है कि आर्थिक ताकत के मामले में ईयू फिलहाल अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट पार्टनर है।
बसुमल्लिक ने स्पष्ट किया कि जब तक समझौते की बारीक शर्तें और शुल्कों में कटौती की पूरी जानकारी सामने नहीं आती, तब तक सटीक असर बताना मुश्किल है। उनके अनुसार, अगर वियतनाम या चीन जैसे देशों के पास ईयू के साथ पहले से बेहतर डील है, तो भारत के लिए मुकाबला कड़ा होगा।
टेक्सटाइल सेक्टर को मिल सकती है राहत
निर्यात क्षेत्र में टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग) के लिए यह डील संजीवनी बन सकती है। फिलहाल भारतीय कपड़ों पर ईयू में 10 से 16 प्रतिशत तक का भारी टैक्स लगता है, जबकि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को वहां जीरो टैक्स की सुविधा मिलती है। इस वजह से भारत की हिस्सेदारी ईयू के बाजार में महज 5-6 प्रतिशत ही है।
नए समझौते से टैक्स कम होने पर भारतीय कपड़ा उद्योग को नई मजबूती मिलेगी। इसके अलावा पेट्रोलियम और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे बड़े निर्यात क्षेत्रों को भी इससे काफी उम्मीदें हैं।
ऑटो सेक्टर में बड़ा बदलाव संभव
सबसे बड़ा बदलाव लग्जरी कार बाजार में देखने को मिल सकता है। अनुमान है कि लग्जरी गाड़ियों पर ड्यूटी 110 प्रतिशत से घटकर अंत में 10 प्रतिशत तक आ सकती है। अभिषेक बसुमल्लिक ने चेतावनी दी हैं कि इससे भारतीय ऑटो बाजार में बड़ी हलचल होगी।
अगर 60 लाख की लग्जरी गाड़ी 35 लाख रुपये में मिलने लगी, तो यह महिंद्रा और किया (Kia) जैसी कंपनियों की महंगी एसयूवी (SUV) की बिक्री को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, लंबी अवधि में मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां भारत में ही अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और सप्लाई चेन लगा सकती हैं, जो देश के लिए बेहतर होगा।
डिफेंस सेक्टर पर नजर
रक्षा क्षेत्र को लेकर भी एक्सपर्ट्स काफी उत्साहित हैं। बसुमल्लिक का कहना है कि ईयू रक्षा क्षेत्र पर काफी खर्च कर रहा है और भारत रक्षा उत्पादों की सप्लाई के लिए उनका एक स्वाभाविक साझेदार बन सकता है। कुल मिलाकर, यह डील रातों-रात बदलाव नहीं लाएगी, लेकिन अगले 5 से 7 सालों में इसके दूरगामी और सकारात्मक परिणाम दिखने की पूरी उम्मीद है।