Explained: क्या है NSE-BSE का नया क्लोजिंग प्राइस सिस्टम? जानिए इससे जुड़े अहम सवालों के जवाब

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इस बदलाव का मकसद भारत के शेयर बाजार को दुनिया के बड़े एक्सचेंजों के बराबर लाना और क्लोजिंग प्राइस में संभावित हेरफेर की संभावना को कम करना है। हालांकि, नए सिस्टम के पहले दो कारोबारी दिनों में शेयरों के क्लोजिंग प्राइस में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे ट्रेडर्स के बीच भ्रम की स्थिति बन गई।

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In Short

  • NSE और BSE ने 200 से ज्यादा डेरिवेटिव्स वाले शेयरों के लिए नया क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम लागू किया है, जिससे अब क्लोजिंग प्राइस ऑक्शन के जरिए तय होगी।
  • नए सिस्टम का उद्देश्य क्लोजिंग प्राइस में हेरफेर की संभावना कम करना और भारतीय शेयर बाजार को वैश्विक एक्सचेंजों के समान बनाना है।
  • शुरुआती दो कारोबारी दिनों में क्लोजिंग प्राइस में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे ट्रेडर्स और निवेशकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी है।

By BT बाज़ार डेस्क:

भारत के दो बड़े शेयर बाजार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने बीते सोमवार से 200 से ज्यादा ऐसे शेयरों के लिए नया क्लोजिंग प्राइस सिस्टम लागू किया है, जिनमें डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स उपलब्ध हैं। इसके साथ कई सालों से चल रही पुरानी व्यवस्था की जगह अब क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम ने ले ली है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इस बदलाव का मकसद भारत के शेयर बाजार को दुनिया के बड़े एक्सचेंजों के बराबर लाना और क्लोजिंग प्राइस में संभावित हेरफेर की संभावना को कम करना है। हालांकि, नए सिस्टम के पहले दो कारोबारी दिनों में शेयरों के क्लोजिंग प्राइस में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे ट्रेडर्स के बीच भ्रम की स्थिति बन गई।

क्लोजिंग प्राइस काफी अहम होता है क्योंकि इसी के आधार पर इंडेक्स फंड, ETF, म्यूचुअल फंड, डेरिवेटिव्स सेटलमेंट और पोर्टफोलियो की वैल्यू तय होती है। आज हम आपको इस आर्टिकल में इससे जुड़े हर सवाल का जवाब देंगे।

नया क्लोजिंग सिस्टम कैसे काम करता है?

अब तक शेयर बाजार में सुबह 9:15 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक लगातार ट्रेडिंग होती थी। दिन का आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस आखिरी 30 मिनट में हुए सभी सौदों के वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर तय किया जाता था।

अब नए सिस्टम में डेरिवेटिव्स वाले शेयरों के लिए लगातार ट्रेडिंग 3:15 बजे खत्म हो जाती है। इसके बाद 3:15 बजे से 3:35 बजे तक 20 मिनट का क्लोजिंग ऑक्शन चलता है। इस दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर लिए जाते हैं, लेकिन तुरंत मैच नहीं किए जाते।

ऑक्शन खत्म होने पर एक्सचेंज ऐसा प्राइस तय करता है, जहां सबसे ज्यादा खरीद और बिक्री के ऑर्डर पूरे हो सकें। यही उस शेयर का आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस होता है। डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पहले की तरह 3:40 बजे तक जारी रहती है। जिन शेयरों में डेरिवेटिव्स नहीं हैं, उनके लिए पुराना सिस्टम ही लागू रहेगा।

यह बदलाव क्यों किया गया?

इस बदलाव का उद्देश्य बेहतर प्राइस डिस्कवरी करना है। पहले आखिरी 30 मिनट में सैकड़ों छोटे-छोटे सौदों के जरिए क्लोजिंग प्राइस बनता था, जबकि अब एक तय समय पर ऑक्शन के जरिए कीमत तय होगी।

इससे बाजार बंद होने से ठीक पहले बेंचमार्क कीमतों को प्रभावित करना पहले की तुलना में मुश्किल होगा। दुनिया के कई बड़े शेयर बाजार जैसे न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज, नैस्डैक, लंदन स्टॉक एक्सचेंज और ऑस्ट्रेलियन सिक्योरिटीज एक्सचेंज पहले से ही क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं।

भारतीय बाजार नियामक सेबी ने 2024 में पहली बार इसका प्रस्ताव रखा था। बड़े इंडेक्स ट्रैकिंग पैसिव फंड्स ने ट्रैकिंग एरर कम करने के लिए ऐसी व्यवस्था की मांग की थी।

अभी बाजार में क्या हो रहा है?

नए सिस्टम के पहले दो कारोबारी सत्रों में उम्मीद के उलट तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। जहां बाजार 3:15 बजे एक स्तर पर दिख रहा था, वहीं क्लोजिंग ऑक्शन के बाद आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस काफी अलग रहा।

बीते सोमवार को निफ्टी50 का आधिकारिक क्लोजिंग लेवल 3:15 बजे के मुकाबले करीब 0.8% ऊपर रहा। वहीं मंगलवार को यह अंतर करीब 0.6% था।

वहीं, फ्यूचर्स में ज्यादा बदलाव नहीं देखा गया। इससे संकेत मिला कि यह उतार-चढ़ाव मुख्य रूप से क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान हुए सौदों की वजह से था, न कि पूरे बाजार के नजरिए में बदलाव की वजह से।

ऐसा क्यों हो रहा है?

गोल्डमैन सैक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, क्लोजिंग ऑक्शन में फिलहाल लिक्विडिटी कम है क्योंकि ज्यादातर बड़े संस्थागत निवेशक इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं।

कम ऑर्डर होने की वजह से अगर थोड़ी भी खरीद या बिक्री बढ़ती है तो उससे क्लोजिंग प्राइस पर बड़ा असर पड़ सकता है। चूंकि क्लोजिंग प्राइस उस स्तर पर तय होता है जहां सबसे ज्यादा ऑर्डर पूरे हो सकते हैं, इसलिए बड़े प्राइस वाले ऑर्डर ज्यादा असर डाल रहे हैं।

सोमवार देर शाम NSE ने कहा कि समय के साथ ऑक्शन में भागीदारी बढ़ेगी और सिस्टम बेहतर तरीके से काम करने लगेगा। विदेशों में भी क्लोजिंग ऑक्शन में बड़ी हिस्सेदारी संस्थागत निवेशकों की होती है।

ट्रेडर्स और निवेशकों में भ्रम क्यों है?

कई दशकों से ट्रेडर्स 3:15 बजे तक की लगातार ट्रेडिंग को ही बाजार बंद होने का आधार मानते रहे हैं। अब 3:15 बजे बाजार का स्तर कुछ और होता है, जबकि आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस 20 मिनट बाद तय होता है।

पिछले दो दिनों में दोनों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला, जिससे कई ट्रेडर्स हैरान रह गए। खास बात यह रही कि डेरिवेटिव्स की कीमतें हमेशा कैश मार्केट में आए इस बदलाव को नहीं दिखा रही थीं।

छोटे निवेशकों ने सोशल मीडिया पर पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ऑक्शन के दौरान एक्सचेंज जो संभावित इक्विलिब्रियम प्राइस दिखाते हैं, वह कई रिटेल ट्रेडिंग ऐप्स पर आसानी से नजर नहीं आता।

अब तक इसका क्या असर पड़ा है?

नए सिस्टम की वजह से आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। बेंचमार्क इंडेक्स, आर्बिट्राज फंड, डेरिवेटिव्स सेटलमेंट और उन पोर्टफोलियो पर असर पड़ा है जिनकी वैल्यू क्लोजिंग प्राइस के आधार पर तय होती है।

3:15 बजे ट्रेडिंग खत्म होने और आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस आने के बीच बढ़े अंतर ने रियल टाइम में हेजिंग करना भी मुश्किल बना दिया है। इसके चलते ट्रेडर्स अपनी ट्रेडिंग रणनीतियों में बदलाव करने पर विचार कर रहे हैं।

क्या दूसरे देशों में भी ऐसा हुआ था?

दुनिया के कई विकसित शेयर बाजारों में क्लोजिंग ऑक्शन पहले से लागू है और वहां इसमें बड़े संस्थागत निवेशक सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं।

शुरुआती दौर में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में भी क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। लेकिन समय के साथ सिस्टम स्थिर हो गया।

ऑस्ट्रेलिया में कोविड-19 के दौरान एक कारोबारी सत्र में S&P/ASX 200 इंडेक्स 4.4% की बढ़त के साथ बंद हुआ था। इसमें करीब 3 प्रतिशत अंक की तेजी सिर्फ क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान आई थी। यह 2008 के बाद उस इंडेक्स की सबसे बड़ी एक दिन की छलांग थी।

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