सोना, रियल एस्टेट और शेयर बाजार पर एक जैसा टैक्स लगेगा? जानिए वित्त मंत्री के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती
शेयर बाजार, सोना और रियल एस्टेट पर एक जैसा टैक्स लगाने को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। Ved Jain & Associates के पार्टनर अंकित जैन ने बताया कि सभी निवेश विकल्पों को एक ही नजरिए से देखना क्यों सही नहीं हो सकता। आखिर इक्विटी को अलग टैक्स व्यवस्था देने के पीछे क्या तर्क है?

In Short
- शेयर बाजार, सोना और रियल एस्टेट पर समान टैक्स को लेकर बहस तेज।
- अंकित जैन ने इक्विटी को अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादक निवेश बताया।
- टैक्स व्यवस्था में सरलता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन जरूरी।
भारत में शेयर बाजार से होने वाली कमाई पर टैक्स को लेकर बहस तेज हो रही है। अब सवाल सिर्फ टैक्स की दरों का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि क्या शेयर बाजार, सोना और रियल एस्टेट जैसे सभी निवेश विकल्पों पर एक जैसा टैक्स लगना चाहिए? बिजनेस टुडे के शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए Ved Jain & Associates के पार्टनर अंकित जैन ने कहा कि सभी एसेट क्लास पर एक समान टैक्स लगाने से निवेशकों को आसानी जरूर होगी, लेकिन अर्थव्यवस्था में उनके अलग-अलग योगदान को भी समझना जरूरी है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की हालिया टिप्पणियों के बाद इक्विटी टैक्स व्यवस्था में बदलाव की उम्मीदों को लेकर चर्चा फिर शुरू हुई है। हालांकि, सरकार की तरफ से अभी किसी बदलाव का संकेत नहीं दिया गया है।
क्या सभी निवेश पर एक जैसा टैक्स होना चाहिए?
अंकित जैन के मुताबिक, निवेशकों के नजरिए से सभी एसेट क्लास पर एक जैसा टैक्स होना बेहतर लग सकता है। इससे टैक्स व्यवस्था समझना आसान होगा और निवेश से जुड़े फैसलों में भी सहूलियत मिलेगी।
उन्होंने कहा कि आदर्श स्थिति में वह भी चाहेंगे कि सभी एसेट क्लास पर टैक्स समान रहे। लेकिन हर निवेश का उद्देश्य अलग होता है और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर भी अलग-अलग पड़ता है।
ऐसे में सिर्फ टैक्स व्यवस्था को आसान बनाने के लिए सभी निवेश विकल्पों को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं होगा।
सोने और रियल एस्टेट से अलग क्यों है इक्विटी?
अंकित जैन ने सोने और रियल एस्टेट का उदाहरण देते हुए समझाया कि हर निवेश सीधे तौर पर आर्थिक विकास में योगदान नहीं देता।
उनके मुताबिक, सोने जैसे एसेट आमतौर पर नॉन-प्रोडक्टिव होते हैं। यानी इनमें लगाया गया पैसा सीधे तौर पर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में योगदान नहीं देता। इसी तरह केवल निवेश के उद्देश्य से खरीदी गई रियल एस्टेट भी जरूरी नहीं कि उत्पादक एसेट की तरह काम करे।
वहीं, इक्विटी में निवेश का पैसा कंपनियों और कारोबार से जुड़ता है। इससे उद्योगों के विस्तार, उत्पादन बढ़ाने और रोजगार पैदा करने में मदद मिलती है।
इक्विटी को अलग टैक्स व्यवस्था क्यों मिले?
अंकित जैन का तर्क है कि इक्विटी में लगाया गया पैसा कारोबार और कंपनियों के विकास से जुड़ा होता है। इसका फायदा व्यापक अर्थव्यवस्था को भी मिल सकता है।
इसी वजह से उनका मानना है कि इक्विटी पर टैक्स तय करते समय उसके आर्थिक योगदान को ध्यान में रखना चाहिए। केवल सभी निवेश विकल्पों पर एक जैसा टैक्स लगाने के उद्देश्य से फैसला नहीं होना चाहिए।
अब वित्त मंत्री के फैसले पर नजर
अंकित जैन ने यह भी माना कि एक समान टैक्स व्यवस्था निवेशकों के लिए ज्यादा आसान और स्पष्ट होती है।
हालांकि, उनके मुताबिक अंतिम फैसला वित्त मंत्री को करना है कि टैक्स व्यवस्था की सरलता और आर्थिक विकास की जरूरतों के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।
ऐसे में आने वाले समय में इक्विटी टैक्स पर चर्चा सिर्फ निवेशकों से वसूले जाने वाले टैक्स तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इस सवाल पर भी होगी कि सरकार किस तरह के निवेश को बढ़ावा देना चाहती है।