RBI क्यों बढ़ाता या घटाता है रेपो रेट? महंगाई, लोन, EMI और अर्थव्यवस्था पर समझें इसका पूरा असर
RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है। इस फैसले का असर लोन और EMI पर पड़ सकता है। लेकिन आखिर RBI रेपो रेट क्यों बढ़ाता या घटाता है और इसके पीछे महंगाई व अर्थव्यवस्था की क्या भूमिका होती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आज रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर दी है। इस बढ़ोतरी के बाद रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गया है। RBI के इस फैसले का सीधा असर लोन की ब्याज दरों पर देखने को मिल सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि RBI आखिर रेपो रेट बढ़ाता या घटाता क्यों है? इसका सीधा संबंध देश में महंगाई, आर्थिक गतिविधियों और बाजार में पैसों की उपलब्धता से है।
क्या होता है रेपो रेट?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI बैंकों को कम अवधि के लिए पैसा उधार देता है। जब बैंकों को RBI से मिलने वाला पैसा महंगा या सस्ता होता है, तो इसका असर आगे चलकर बैंकों की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है।
यानी रेपो रेट में बदलाव का असर सिर्फ बैंकों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन और दूसरे फ्लोटिंग रेट वाले लोन की ब्याज दरों पर भी देखने को मिल सकता है।
RBI रेपो रेट क्यों बढ़ाता है?
RBI के रेपो रेट बढ़ाने की सबसे बड़ी वजह महंगाई को नियंत्रित करना होती है। जब अर्थव्यवस्था में मांग मजबूत होती है और बाजार में पैसों का फ्लो ज्यादा होता है, तो सामान और सेवाओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में RBI ब्याज दर बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में पैसों की उपलब्धता को कुछ हद तक कम करने की कोशिश करता है। रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो सकता है। इसका असर ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है।
लोन महंगा होने पर लोग नया कर्ज लेने या ज्यादा खर्च करने से बच सकते हैं। इससे बाजार में मांग कम करने और महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
RBI रेपो रेट कब घटाता है?
अगर अर्थव्यवस्था की रफ्तार कमजोर पड़ रही हो, मांग कम हो रही हो और महंगाई नियंत्रण में हो, तो RBI ब्याज दरों में कटौती कर सकता है।
रेपो रेट कम होने पर बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना सस्ता हो सकता है। इसका फायदा ग्राहकों को भी मिल सकता है और होम लोन, कार लोन जैसे फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की ब्याज दरों में कमी की गुंजाइश बन सकती है।
कम ब्याज दर का मकसद लोगों को ज्यादा खर्च करने और कंपनियों को ज्यादा निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होता है। इससे आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने में मदद मिल सकती है।
होम लोन और EMI पर क्या असर पड़ेगा?
रेपो रेट में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर उन ग्राहकों पर पड़ सकता है जिनका लोन फ्लोटिंग ब्याज दर से जुड़ा हुआ है। ऐसे लोन की ब्याज दर RBI और बैंक की नीतियों के आधार पर समय-समय पर बदल सकती है।
अगर बैंक रेपो रेट में हुई पूरी बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों पर डालते हैं, तो होम लोन की ब्याज दर बढ़ सकती है। इससे ग्राहक की EMI बढ़ सकती है या लोन की अवधि लंबी हो सकती है, यह बैंक के रीसेट नियमों पर निर्भर करता है।
हालांकि, इसका वास्तविक असर हर ग्राहक पर अलग होगा, क्योंकि यह उसके लोन की रकम, ब्याज दर, बची हुई अवधि और बैंक की ब्याज दर में बदलाव पर निर्भर करता है।