शेयर बाजार में निवेश करते हैं? STT से लेकर LTCG और STCG तक, जानें हर टैक्स की पूरी जानकारी

शेयर बाजार में निवेश करने वालों को सिर्फ मुनाफे पर ही टैक्स नहीं देना पड़ता, बल्कि शेयर खरीदने से लेकर बेचने तक कई तरह के टैक्स और चार्ज चुकाने होते हैं। टैक्स एक्सपर्ट अंकित जैन ने निवेशकों पर पड़ने वाले इस बोझ को लेकर अहम बातें बताई हैं। जानिए पूरी डिटेल।

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In Short

  • शेयर खरीदने से लेकर बेचने तक निवेशकों को कई तरह के टैक्स और चार्ज देने पड़ते हैं।
  • अंकित जैन ने बताया कि ब्रोकरेज, GST और डिपॉजिटरी फीस से भी निवेश का खर्च बढ़ता है।
  • वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान के बाद इक्विटी टैक्स में बदलाव की चर्चा तेज हुई है।

By Sonam:

भारत में शेयर बाजार से जुड़े टैक्स को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। आमतौर पर निवेशक शेयर बाजार में होने वाले मुनाफे पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCG) और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स (STCG) पर ध्यान देते हैं। लेकिन शेयर बाजार में निवेश करने वालों को सिर्फ यही टैक्स नहीं चुकाने पड़ते। शेयर खरीदने से लेकर बेचने और होल्ड करने तक कई तरह के टैक्स और चार्ज देने होते हैं।

बिजनेस टुडे के शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए Ved Jain & Associates के पार्टनर अंकित जैन ने कहा कि इक्विटी निवेश पर कई तरह के टैक्स लगते हैं। निवेशकों को शेयर खरीदते समय, उन्हें अपने पास रखने के दौरान और बेचते वक्त अलग-अलग टैक्स और चार्ज चुकाने पड़ते हैं।

शेयर खरीदने और बेचने पर कितना टैक्स?

अंकित जैन ने बताया कि जब कोई निवेशक शेयर खरीदता है, तो उसे स्टांप ड्यूटी और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) जैसे टैक्स चुकाने पड़ते हैं। इसके अलावा डिपॉजिटरी से जुड़े चार्ज भी लगते हैं।

वहीं, जब निवेशक शेयर बेचता है, तो उस पर भी STT लगता है। अगर शेयर बेचने से मुनाफा होता है, तो होल्डिंग पीरियड के आधार पर LTCG या STCG टैक्स देना पड़ सकता है।

अंकित जैन के मुताबिक, इक्विटी निवेश पर टैक्स का बोझ किसी एक चरण तक सीमित नहीं है। अगर निवेशक शेयर अपने पास रखता है और उस पर डिविडेंड मिलता है, तो वह डिविडेंड भी टैक्स के दायरे में आता है।

ब्रोकरेज और GST से भी बढ़ता है खर्च

शेयर बाजार में निवेश करने वालों को सिर्फ सरकारी टैक्स ही नहीं, बल्कि कई दूसरे चार्ज भी देने पड़ते हैं।

अंकित जैन ने बताया कि ब्रोकर के जरिए शेयरों की खरीद-बिक्री करने पर ब्रोकरेज, डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट फीस और टर्नओवर फीस जैसे खर्च भी होते हैं। इसके अलावा ब्रोकरेज पर GST भी देना पड़ता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

इसका मतलब है कि निवेशक को होने वाले कुल मुनाफे पर इन सभी खर्चों का असर पड़ सकता है। खासतौर पर बार-बार ट्रेडिंग करने वाले और छोटी रकम निवेश करने वाले लोगों के लिए ये चार्ज अहम हो जाते हैं।

वित्त मंत्री के बयान के बाद क्यों बढ़ी चर्चा?

शेयर बाजार से जुड़े टैक्स पर यह चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बाजार से जुड़े टैक्स पर सुझाव सुनने की इच्छा जताई है।

हालांकि, वित्त मंत्री ने अभी टैक्स व्यवस्था में किसी बदलाव का संकेत नहीं दिया है। इसके बावजूद बाजार में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या सरकार आने वाले समय में इक्विटी टैक्स की समीक्षा कर सकती है।

क्या सिर्फ LTCG और STCG में बदलाव काफी होगा?

अंकित जैन की बातों से यह सवाल उठता है कि क्या शेयर बाजार में निवेशकों को राहत देने के लिए सिर्फ कैपिटल गेन टैक्स में बदलाव करना पर्याप्त होगा?

दरअसल, निवेशकों को खरीदारी से लेकर बिक्री तक कई तरह के टैक्स और चार्ज देने पड़ते हैं। ऐसे में भविष्य में इक्विटी टैक्स व्यवस्था की समीक्षा होती है, तो पूरे ट्रांजैक्शन पर लगने वाले खर्चों को भी देखना अहम हो सकता है।

फिलहाल, सरकार की ओर से किसी टैक्स कटौती या बदलाव की घोषणा नहीं हुई है। लेकिन चर्चा अब केवल टैक्स की दरों तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशकों पर पड़ने वाले कुल बोझ पर भी केंद्रित हो रही है।

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