30 लाख सैलरी फिर भी अमीर नहीं? महानगरों में ‘मिडल क्लास ट्रैप’ की हकीकत ने छेड़ी नई बहस

सेबी से जुड़े निवेश सलाहकार के अनुसार, मुंबई-बेंगलुरु जैसे शहरों में 30 लाख की सैलरी भी लोगों को अमीर नहीं बनाती। बढ़ते खर्च, टैक्स, EMI और लाइफस्टाइल लागत के कारण बचत 10% से कम रह जाती है, जिससे लोग ‘मिडल क्लास ट्रैप’ में फंसते जा रहे हैं।

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By Gaurav Kumar:

भारत के बड़े शहरों में साल भर के 30 लाख रुपये कमाने वाला व्यक्ति क्या वाकई अमीर है? सोशल मीडिया पर छिड़ी एक नई बहस ने इस धारणा को हिला कर रख दिया है।

सेबी (SEBI) रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर और एचपी प्राइवेट वेल्थ के फाउंडर हिमांशु प्रवीणचंद्र पंड्या की एक पोस्ट इन दिनों इंटरनेट पर सुर्खियां बटोर रही है। उन्होंने तर्क दिया है कि मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में महीने के 2.5 लाख रुपये कमाने वाले प्रोफेशनल लोग असल में 'मिडल क्लास ट्रैप' यानी मध्यम वर्ग के जाल में फंसते जा रहे हैं।

दिखावे की रईसी और खाली हाथ

हिमांशु पंड्या का मानना है कि 30 लाख रुपये का सालाना पैकेज कागज पर सुनने में बहुत बड़ा लगता है, लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। उन्होंने इसे 'मिडल क्लास इल्यूजन' का नाम दिया है, जहां बढ़ती लाइफस्टाइल लागत आपकी दौलत बनाने की क्षमता को खत्म कर देती है। पंड्या ने बताया कि मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में इतनी कमाई आपको रईस नहीं बनाती, बल्कि आप उस दबी हुई परत का हिस्सा बन जाते हैं जो हर तरफ से खर्चों की मार झेल रही है।

खर्चों की लंबी लिस्ट और 'कन्वीनियंस टैक्स'

शहरी जीवन के बजट पर बात करते हुए पंड्या ने शिक्षा को सबसे बड़ा बोझ बताया है। उनके अनुसार, महानगरों के प्राइवेट स्कूलों की फीस आज एक बच्चे के लिए सालाना 4 लाख से 6 लाख रुपये के बीच है।

इसके अलावा, उन्होंने 'कन्वीनियंस टैक्स' का जिक्र किया, जिसमें डिजिटल सब्सक्रिप्शन और लाइफस्टाइल मेंबरशिप शामिल हैं। ये छोटे-छोटे दिखने वाले खर्च महीने के लगभग 15,000 रुपये तक पहुंच जाते हैं। हाउसिंग सोसायटियों का मेंटेनेंस चार्ज भी अब इतना बढ़ गया है जितना कुछ साल पहले घरों का किराया हुआ करता था।

पंड्या ने बताया कि टैक्स, ईएमआई, इंश्योरेंस और रोजमर्रा के खर्चों के बाद ऊंचे पैकेज वाले इन प्रोफेशनल्स के पास बचत के नाम पर 10% से भी कम हिस्सा बचता है। वे कहते हैं कि लोग अपनी विरासत नहीं बना रहे, बल्कि सिर्फ एक महंगी ट्रेडमिल को चला रहे हैं। उन्होंने सलाह दी कि लोगों को अपनी वित्तीय सेहत सैलरी से नहीं, बल्कि 'फ्रीडम रेशियो' से मापनी चाहिए। यानी सब खर्चों के बाद आपके पास निवेश के लिए कितना पैसा बचता है।

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