हेल्थ इंश्योरेंस वालों के लिए बड़ी खबर, अस्पताल के बिल और क्लेम को लेकर बदल सकती है पूरी व्यवस्था
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़े कई बड़े बदलावों की तैयारी चल रही है। बढ़ते इलाज के खर्च के बीच क्लेम सेटलमेंट, अस्पतालों की दरों और कवरेज को लेकर नए कदम उठाए जा सकते हैं। प्रस्ताव लागू हुए तो पॉलिसीहोल्डर्स पर सीधा असर पड़ेगा। जानिए आखिर क्या बदलने की तैयारी है।

In Short
- मेडिकल इन्फ्लेशन सालाना करीब 12% से 14% होने का अनुमान
- इलाज की दरों को बेंचमार्क करने के प्रस्ताव पर हो रहा विचार
- नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर
भारत में इलाज का खर्च तेजी से बढ़ रहा है और इसका असर सीधे हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले लोगों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक मेडिकल इन्फ्लेशन हर साल करीब 12% से 14% है। इसी वजह से हेल्थ इंश्योरेंस को ज्यादा साफ, आसान और एक जैसा बनाने के लिए कई बड़े रिफॉर्म्स पर विचार किया जा रहा है। इनमें इलाज की दरें तय करने से लेकर क्लेम के लिए एक कॉमन प्लेटफॉर्म तक शामिल है। अब जानिए किन बदलावों पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
इलाज की दरें हो सकती हैं बेंचमार्क
सूत्रों के मुताबिक इंश्योरर्स और हॉस्पिटल्स के बीच इलाज की दरों को बेंचमार्क करने का प्रस्ताव है। इसका मकसद इलाज की कीमतों को ज्यादा स्टैंडर्डाइज्ड बनाना, विवाद कम करना और गलत या फ्रॉड क्लेम्स पर रोक लगाना है। इंडस्ट्री के अनुमान के अनुसार करीब 10% से 15% हेल्थ क्लेम गैर-जरूरी या फ्रॉड हो सकते हैं।
ये खबर पढ़ना ना भूलें: ₹25 लाख का हेल्थ कवर फिर भी ₹12 लाख के बिल पर मिले सिर्फ ₹5 लाख? समझें कहां कट सकता है क्लेम
साल के आखिर तक आ सकती हैं सिफारिशें
इन रिफॉर्म्स पर रेगुलेटर्स, इंश्योरेंस इंडस्ट्री के प्रतिनिधि, हॉस्पिटल्स और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री यानी CII से जुड़े लोगों की एक कमेटी काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक IRDAI के प्रमुख इस पैनल की अध्यक्षता कर रहे हैं। इसकी सिफारिशें इस साल के आखिर तक आने की उम्मीद है और इन्हें बाद में लागू किया जा सकता है। IRDAI ने इस मामले पर प्रतिक्रिया नहीं दी, जबकि CII के प्रवक्ता ने टिप्पणी करने से इनकार किया।
इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ाना भी बड़ा लक्ष्य
भारत अपनी 1.4 अरब की आबादी में इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ाना चाहता है। देश में इंश्योरेंस पर खर्च GDP के 4% से भी कम है, जबकि ग्लोबल एवरेज 7% से ज्यादा है। भारत की करीब 130 अरब डॉलर की इंश्योरेंस इंडस्ट्री में फॉरेन इन्वेस्टमेंट से जुड़े नियमों में बदलाव और डिस्ट्रीब्यूशन रिफॉर्म्स भी किए गए हैं।
मार्च 2025 में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में भारत के हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में 40 से ज्यादा इंश्योरर्स काम कर रहे थे। इनमें लोम्बार्ड, एर्गो और एआईजी जैसे ग्लोबल ग्रुप्स के जॉइंट वेंचर्स भी शामिल हैं। इस दौरान हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम करीब 1.17 ट्रिलियन रुपये यानी 12.3 अरब डॉलर रहा।
प्राइवेट हॉस्पिटल का खर्च काफी ज्यादा
पार्लियामेंट्री कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्राइवेट हॉस्पिटल में रहने का औसत खर्च करीब 530 डॉलर है, जबकि पब्लिक फैसिलिटीज में यह लगभग 70 डॉलर है। इसी वजह से स्टैंडर्डाइज्ड टैरिफ और बिलिंग ट्रांसपेरेंसी को मेडिकल खर्च की तेज बढ़ोतरी रोकने के अहम तरीकों में देखा जा रहा है।
सभी इंश्योरर्स के लिए कॉमन हेल्थ प्रोडक्ट का प्रस्ताव
रिफॉर्म्स में एक कॉमन हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट लाने पर भी विचार हो रहा है, जिसे सभी इंश्योरर्स को अपने मौजूदा प्लान्स के साथ ऑफर करना पड़ सकता है। इसका मकसद अलग-अलग बीमारियों और इलाज के लिए कवरेज और दरों को ज्यादा स्टैंडर्डाइज्ड करना है।
इसके साथ इलाज की एक यूनिफॉर्म लिस्ट भी बनाई जा सकती है, जिससे पॉलिसीहोल्डर्स के लिए यह समझना आसान होगा कि उनकी पॉलिसी में कौन-कौन से इलाज कवर हैं। अभी अलग-अलग दरों और कवरेज की वजह से ग्राहक बेहतर डील की तलाश में पॉलिसी बदलते रहते हैं।
क्लेम के लिए कॉमन एक्सचेंज पर जोर
कमेटी नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी जोर दे सकती है। यह हेल्थ मिनिस्ट्री और इंश्योरेंस रेगुलेटर की ओर से तैयार किया गया प्लेटफॉर्म है। इसके जरिए हॉस्पिटल्स और इंश्योरर्स एक कॉमन फॉर्मेट में क्लेम और बिलिंग डेटा शेयर कर सकेंगे।
इससे वेरिफिकेशन तेज हो सकता है, कीमतों में ज्यादा ट्रांसपेरेंसी आ सकती है और मरीज के डिस्चार्ज के समय क्लेम सेटलमेंट में लगने वाला वक्त कम हो सकता है। पॉलिसीबाजार के चीफ बिजनेस ऑफिसर अमित छाबड़ा के मुताबिक यह कॉमन एक्सचेंज हॉस्पिटल्स और इंश्योरर्स के बीच एक ब्रिज की तरह काम करके क्लेम सेटलमेंट को तेज कर सकता है।