Health Insurance: सस्ते प्रीमियम के चक्कर में न पड़ें! पॉलिसी पोर्ट कराने से पहले जरूर जान लें ये बातें
हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट कराते समय सिर्फ कम प्रीमियम देखकर फैसला लेना भारी पड़ सकता है। नई पॉलिसी में ज्यादा बीमा कवर, अस्पतालों का नेटवर्क और इलाज पर लगी लिमिट जैसी शर्तें देखना जरूरी है। एक्सपर्ट से जानिए पॉलिसी बदलने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

In Short
- हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट कराते समय सिर्फ सस्ते प्रीमियम पर न जाएं।
- नई पॉलिसी में अस्पतालों का नेटवर्क और इलाज पर लगी लिमिट जरूर जांचें।
- ज्यादा बीमा कवर के साथ रूम रेंट कैपिंग की शर्तों पर भी दें ध्यान।
अगर आप अपना हेल्थ इंश्योरेंस एक कंपनी से दूसरी कंपनी में पोर्ट कराने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ कम प्रीमियम देखकर फैसला लेना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है. कई बार लोग पैसे बचाने के चक्कर में सस्ती पॉलिसी चुन लेते हैं, लेकिन जब इलाज की जरूरत पड़ती है, तो पता चलता है कि नई पॉलिसी में कई तरह की पाबंदियां हैं. ऐसे में कम प्रीमियम का फायदा अस्पताल के भारी बिल के सामने बेकार साबित हो सकता है.
बिजनेस टुडे के शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए Insurance Samadhan के को-फाउंडर और सीईओ दीपक भुवनेश्वरी उनियाल ने कहा कि हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट कराते समय सिर्फ प्रीमियम नहीं, बल्कि पॉलिसी में मिलने वाली सुविधाओं पर भी ध्यान देना चाहिए. उन्होंने ज्यादा सम इंश्योर्ड, अस्पतालों के नेटवर्क, एक्सक्लूजन और रूम रेंट लिमिट जैसी शर्तों को बेहद जरूरी बताया.
सस्ते प्रीमियम के चक्कर में न पड़ें
दीपक उनियाल के मुताबिक, हेल्थ इंश्योरेंस में ज्यादा सम इंश्योर्ड यानी बीमा कवर होना बेहद जरूरी है. मेडिकल खर्च लगातार बढ़ रहा है और गंभीर बीमारियों के इलाज में मोटी रकम खर्च हो सकती है. इसलिए सिर्फ कम प्रीमियम वाली पॉलिसी चुनना सही फैसला नहीं है.
कई बार सस्ती पॉलिसी में ऐसी शर्तें होती हैं, जिनकी वजह से क्लेम के समय ग्राहकों को अपनी जेब से ज्यादा पैसे देने पड़ सकते हैं. इसलिए पोर्ट कराने से पहले नई पॉलिसी की सुविधाओं की तुलना जरूर करें.
अस्पतालों का नेटवर्क जरूर चेक करें
हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट कराने से पहले यह देखना जरूरी है कि नई बीमा कंपनी के नेटवर्क में कौन-कौन से अस्पताल शामिल हैं. खासकर जिस शहर में आप रहते हैं और जिस अस्पताल में इलाज कराना पसंद करते हैं, वह अस्पताल नेटवर्क में होना चाहिए.
अगर आपका पसंदीदा अस्पताल नेटवर्क में नहीं है, तो कैशलेस इलाज लेने में परेशानी हो सकती है. ऐसे में आपको पहले अपनी जेब से भुगतान करके बाद में क्लेम की रकम मांगनी पड़ सकती है.
इन बीमारियों के इलाज पर भी हो सकती है लिमिट
दीपक उनियाल ने बताया कि सिर्फ ज्यादा बीमा कवर मिलने का मतलब यह नहीं है कि नई पॉलिसी बेहतर है. पॉलिसी पोर्ट कराते समय एक्सक्लूजन, इन्क्लूजन और अलग-अलग इलाज पर लगाई गई लिमिट भी देखनी चाहिए.
उदाहरण के लिए, किसी पॉलिसी में ज्यादा कवर होने के बावजूद रोबोटिक सर्जरी या कैंसर के इलाज पर भुगतान की सीमा तय हो सकती है. ऐसे में ज्यादा बीमा कवर होने के बाद भी पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा.
रूम रेंट की लिमिट पर दें खास ध्यान
हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट कराते समय रूम रेंट कैपिंग भी चेक करनी चाहिए. एक्सपर्ट के मुताबिक, ऐसी पॉलिसी चुनना बेहतर है जिसमें अस्पताल के कमरे के किराये पर कोई लिमिट न हो.
दरअसल, रूम रेंट कैपिंग का असर सिर्फ कमरे के किराये पर नहीं, बल्कि अस्पताल के दूसरे खर्चों पर भी पड़ सकता है. इसलिए पॉलिसी बदलते समय प्रीमियम में बचत से ज्यादा जरूरी यह देखना है कि इलाज के समय आपको कितना फायदा मिलेगा.