दिवाली पर बैंक दे रहे सस्ते लोन का ऑफर! कम EMI देखकर न करें ये गलती, बाद में पड़ सकती है भारी
दिवाली पर बैंक और फाइनेंस कंपनियां कम ब्याज, Zero Interest EMI और प्रोसेसिंग फीस में छूट जैसे आकर्षक ऑफर्स दे रही हैं। लेकिन क्या इन ऑफर्स से सच में पैसे बचते हैं? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कम EMI और जीरो ब्याज के पीछे कुछ ऐसी शर्तें हो सकती हैं, जो आपका खर्च बढ़ा दें। जानिए लोन लेने से पहले क्या जांचना जरूरी है।

In Short
- Zero Interest Loan में भी छिपे चार्ज बढ़ा सकते हैं कुल खर्च।
- कम EMI के लिए लंबी अवधि चुनने पर ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है।
- लोन लेने से पहले KFS, APR और सभी शर्तों की जांच जरूरी।
दिवाली के मौके पर बैंक और फाइनेंस कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए सस्ते ब्याज, प्रोसेसिंग फीस में छूट और जीरो इंटरेस्ट लोन जैसे ऑफर्स दे रही हैं। अगर आप भी इस फेस्टिव सीजन में नई कार, बाइक या घर खरीदने के लिए लोन लेने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ कम EMI देखकर फैसला करना महंगा पड़ सकता है। कई बार आकर्षक दिखने वाले ऑफर्स में छिपे चार्ज और शर्तों की वजह से ग्राहकों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं।
Zero Interest Loan के पीछे क्या है असली गणित?
BankBazaar के CEO आदिल शेट्टी के मुताबिक, जीरो इंटरेस्ट लोन का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि आपको बिना किसी अतिरिक्त खर्च के पैसा मिल रहा है। कई बार ब्याज की लागत दूसरी जगह शामिल कर दी जाती है। उदाहरण के लिए, कैश पेमेंट पर मिलने वाला डिस्काउंट लोन लेने पर खत्म हो सकता है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, एडवांस EMI, इंश्योरेंस और दूसरी सुविधाओं के चार्ज भी देने पड़ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सिद्धार्थ बत्रा का कहना है कि ग्राहकों को लोन लेने से पहले पूरा पेमेंट ब्रेकअप, Key Facts Statement (KFS), Annual Percentage Rate (APR) और सभी चार्ज की जानकारी मांगनी चाहिए। अगर कोई कंपनी 100 प्रतिशत छूट का दावा कर रही है, तो यह समझना जरूरी है कि छूट ब्याज पर है, प्रोसेसिंग फीस पर या किसी दूसरी चीज पर।
कम EMI के चक्कर में बढ़ सकता है खर्च
TransUnion CIBIL की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 की पहली छमाही में पैसेंजर व्हीकल लोन की औसत मंजूर राशि बढ़कर 8.2 लाख रुपये पहुंच गई। यह 2019 की पहली छमाही के मुकाबले 49 प्रतिशत ज्यादा है। इसी दौरान औसत लोन अवधि बढ़कर 62 महीने हो गई।
आदिल शेट्टी के अनुसार, लंबी अवधि का लोन लेने से हर महीने की EMI कम हो सकती है, लेकिन कुल ब्याज का खर्च बढ़ जाता है। इसलिए दो लोन ऑफर्स की तुलना करते समय केवल ब्याज दर नहीं, बल्कि पूरी अवधि में चुकाई जाने वाली रकम देखनी चाहिए।
उनके मुताबिक, आम तौर पर सभी लोन की कुल EMI को मासिक इन-हैंड सैलरी के 40 प्रतिशत के भीतर रखना बेहतर माना जाता है। कार खरीदते समय इंश्योरेंस, पेट्रोल और मेंटेनेंस के खर्च को भी बजट में शामिल करना चाहिए।
लोन लेने से पहले इन शर्तों की करें जांच
फेस्टिव ऑफर्स में दिखाई जाने वाली शुरुआती ब्याज दर हर ग्राहक को मिले, यह जरूरी नहीं है। वास्तविक ब्याज दर क्रेडिट स्कोर, आय, लोन राशि और अवधि पर निर्भर कर सकती है। ग्राहकों को यह भी जांचना चाहिए कि ब्याज दर फिक्स्ड है या फ्लोटिंग और प्रोसेसिंग फीस की छूट पूरी है या किसी सीमा तक।
सिद्धार्थ बत्रा के मुताबिक, किसी भी ऑफर को स्वीकार करने से पहले बैंक या फाइनेंस कंपनी से लिखित में यह जानकारी लें कि ऑफर के साथ और बिना ऑफर के कुल कितना भुगतान करना होगा। यह भी जांचें कि छूट तुरंत मिलेगी या बाद में कैशबैक के रूप में। लोन एग्रीमेंट और विज्ञापन में अलग-अलग शर्तें होने पर भुगतान करने से पहले उन्हें स्पष्ट कराना जरूरी है।
वादा किया गया डिस्काउंट न मिले तो क्या करें?
अगर बैंक या डीलर विज्ञापन में किया गया वादा पूरा नहीं करता है, तो ग्राहक को सबसे पहले लिखित शिकायत करनी चाहिए। इसके लिए विज्ञापन, स्क्रीनशॉट, WhatsApp मैसेज, ईमेल, भुगतान की रसीद और लोन से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखें।
समस्या का समाधान नहीं होने पर ग्राहक संबंधित बैंक के शिकायत निवारण अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। पात्र मामलों में RBI Ombudsman के पास शिकायत की जा सकती है। इसके अलावा नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन के नंबर 1915 पर भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि दिवाली पर लोन लेने का फैसला सिर्फ ऑफर या कम EMI देखकर नहीं करना चाहिए। असली बचत का पता तभी चलेगा, जब आप कुल ब्याज, सभी चार्ज और पूरी लोन अवधि में चुकाई जाने वाली रकम की तुलना करेंगे।