Direct Bonds vs Debt Funds: बेहतर रिटर्न के लिए कहां लगाएं पैसा? एक्सपर्ट से समझें

डेब्ट म्यूचुअल फंड और डायरेक्ट बॉन्ड दोनों ही फिक्स्ड इनकम निवेश के विकल्प हैं लेकिन दोनों का तरीका अलग है। एक्सपर्ट विशाल गोयनका ने बताया कि लिक्विडिटी और संभावित रिटर्न के मामले में इनमें क्या फर्क है और निवेशकों को पैसा लगाने से पहले किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

Advertisement

In Short

  • डेब्ट म्यूचुअल फंड में निवेशकों को आसान एंट्री और एग्जिट के साथ लिक्विडिटी मिलती है
  • एक्सपर्ट के मुताबिक फिक्स्ड इनकम में सालाना 3% ज्यादा रिटर्न लंबे समय में बड़ा अंतर पैदा कर सकता है
  • डायरेक्ट बॉन्ड में निवेश के लिए इश्यूअर रेटिंग मैच्योरिटी और लिक्विडिटी को समझना जरूरी है

By Gungun Mishra:

निवेश की बात आती है तो फिक्स्ड इनकम के लिए कई निवेशक डेब्ट म्यूचुअल फंड का रास्ता चुनते हैं। बिजनेस टुडे के एक शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए Indiabonds के को-फाउंडर विशाल गोयनका ने कहा कि निवेशकों को डेब्ट म्यूचुअल फंड और डायरेक्ट बॉन्ड के बीच चुनाव करते समय सिर्फ आसान निवेश को नहीं देखना चाहिए। दोनों में सबसे बड़ा अंतर लिक्विडिटी और संभावित रिटर्न का है। डेब्ट फंड जहां आसानी और लिक्विडिटी देते हैं वहीं डायरेक्ट बॉन्ड में ज्यादा मेहनत के साथ बेहतर रिटर्न की संभावना हो सकती है। 

डेब्ट फंड में क्या है खास?

विशाल गोयनका के मुताबिक डेब्ट फंड और डायरेक्ट बॉन्ड दोनों एक साथ निवेश का हिस्सा हो सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे निवेशक इक्विटी म्यूचुअल फंड और सीधे शेयरों में निवेश करते हैं।

उनके मुताबिक डेब्ट फंड का इस्तेमाल परंपरागत रूप से लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए ज्यादा किया जाता है। करीब 55% डेब्ट म्यूचुअल फंड एसेट्स ओवरनाइट या कम अवधि वाले फंड्स में हैं। इस तरह के निवेश में करीब 6.5% से 7% तक का मिला-जुला रिटर्न देखने को मिल सकता है।

डेब्ट फंड में निवेशकों को NAV के आधार पर आसानी से एंट्री और एग्जिट की सुविधा मिलती है। साथ ही निवेश को प्रोफेशनल तरीके से मैनेज किया जाता है। 

डायरेक्ट बॉन्ड में ज्यादा रिटर्न का दावा

एक्सपर्ट ने डायरेक्ट बॉन्ड में कंपाउंडिंग के फायदे पर जोर दिया। उनका कहना है कि फिक्स्ड इनकम से मिलने वाले सालाना रिटर्न में थोड़ा सा अंतर भी लंबे समय में बड़ा असर डाल सकता है।

उन्होंने कहा कि अगर फिक्स्ड इनकम पर हर साल 3% ज्यादा रिटर्न मिलता है तो 10 साल में इसका असर 58% रिटर्न तक पहुंच सकता है। उनके मुताबिक फिक्स्ड इनकम का काम केवल पूंजी को सुरक्षित रखना नहीं बल्कि बेहतर तरीके से रिटर्न हासिल करना भी होना चाहिए।

छोटे निवेश से भी डायरेक्ट बॉन्ड में एंट्री

विशाल गोयनका के मुताबिक अब डायरेक्ट बॉन्ड में निवेश का मतलब केवल कुछ चुनिंदा बॉन्ड पर पैसा लगाना नहीं है। Bond SIP जैसे प्रोडक्ट के जरिए निवेशक हर महीने कम से कम ₹10,000 अलग-अलग बॉन्ड में लगा सकते हैं।

वहीं एकमुश्त पैसा लगाने वाले निवेशक Bond Case के जरिए रकम को कई अलग-अलग इश्यूअर्स के बॉन्ड में बांट सकते हैं। इससे डायरेक्ट बॉन्ड में भी डायवर्सिफिकेशन किया जा सकता है।

ज्यादा रिटर्न के साथ जिम्मेदारी भी ज्यादा

हालांकि डायरेक्ट बॉन्ड में संभावित ज्यादा रिटर्न के साथ निवेशक की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। निवेश करने से पहले इश्यूअर, क्रेडिट रेटिंग, मैच्योरिटी और लिक्विडिटी को समझना जरूरी है।

एक्सपर्ट के मुताबिक डायरेक्ट बॉन्ड निवेशक थोड़ा ज्यादा जोखिम लेकर ज्यादा रिटर्न हासिल करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में आसान निवेश और लिक्विडिटी चाहने वालों के लिए डेब्ट फंड एक विकल्प हो सकता है जबकि ज्यादा कंट्रोल और संभावित बेहतर रिटर्न चाहने वाले निवेशक डायरेक्ट बॉन्ड पर विचार कर सकते हैं।

Read more!
Advertisement