Corporate vs Retail Health Insurance: कहां मिलेगा आपको ज्यादा कंट्रोल? एक्सपर्ट से जानिए डिटेल्स

कंपनी से मिलने वाला हेल्थ इंश्योरेंस आसान सुविधा जरूर है, लेकिन क्या यह लंबे समय की सुरक्षा के लिए काफी है? एक्सपर्ट आदित्य शाह ने बताया कि कॉरपोरेट कवर में बदलाव की गुंजाइश रहती है। जानिए क्यों खुद की हेल्थ पॉलिसी को लेकर पहले से प्लानिंग करना जरूरी हो सकता है।

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In Short

  • कॉरपोरेट हेल्थ इंश्योरेंस HR के बजट और कंपनी की नीतियों पर निर्भर करता है, जिससे कवर में बदलाव हो सकते हैं।
  • रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस में पॉलिसीधारक को कवर, राइडर्स और सुविधाओं पर ज्यादा नियंत्रण मिलता है।
  • गंभीर बीमारियों के बढ़ते खर्च को देखते हुए समय रहते हेल्थ इंश्योरेंस प्लानिंग करने की सलाह दी गई है।

By Gungun Mishra:

नौकरी करने वाले कई लोग कंपनी की तरफ से मिलने वाले हेल्थ इंश्योरेंस को ही अपनी पूरी सुरक्षा मान लेते हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कॉरपोरेट हेल्थ इंश्योरेंस पर निर्भर रहना लंबे समय में जोखिम भरा हो सकता है। बिजनेस टुडे के एक शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए Hercules Advisors के फाउंडर आदित्य शाह ने बताया कि कंपनी की ओर से मिलने वाला बीमा हर साल के बजट और HR की बातचीत पर निर्भर करता है।

शाह ने कहा कि कॉरपोरेट इंश्योरेंस को HR टीम कंपनियों के बजट के हिसाब से तय करती है। ऐसे में कर्मचारियों के पास पॉलिसी की शर्तों और सुविधाओं को लेकर ज्यादा नियंत्रण नहीं होता। अगर कंपनी का बजट बदलता है तो बीमा के फायदे भी बदल सकते हैं।

बदल सकती हैं पॉलिसी की शर्तें

आदित्य शाह के अनुसार, कॉरपोरेट हेल्थ इंश्योरेंस सुविधाजनक जरूर है, लेकिन इसे लंबे समय की स्वास्थ्य सुरक्षा का पूरा आधार नहीं माना जा सकता। उन्होंने बताया कि एक साल जिस पॉलिसी में को-पेमेंट नहीं हो सकता है, अगले साल उसमें यह सुविधा जोड़ी जा सकती है।

इसी तरह कंपनी का बजट कम होने पर पहले शामिल किए गए डिपेंडेंट पैरेंट्स की कवरेज भी हटाई जा सकती है। यानी कर्मचारी के पास यह तय करने का अधिकार सीमित होता है कि भविष्य में उसे किस तरह का कवर मिलता रहेगा।

रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस में ज्यादा नियंत्रण

इसके मुकाबले रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस में व्यक्ति को ज्यादा नियंत्रण मिलता है। शाह के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति खुद हेल्थ पॉलिसी खरीदता है तो उस समय तय हुए नियम और शर्तें लॉक हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि रिटेल पॉलिसी में ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से राइडर्स और ऐड-ऑन चुन सकता है। इससे लोग अपनी स्वास्थ्य जरूरतों और जोखिम के अनुसार बीमा कवर तैयार कर सकते हैं, जबकि कॉरपोरेट प्लान अक्सर सभी कर्मचारियों के लिए एक जैसा होता है।

गंभीर बीमारियों में कम कवर पड़ सकता है

बढ़ते इलाज के खर्च को देखते हुए पर्याप्त हेल्थ कवर होना जरूरी है। शाह ने कहा कि आज कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज में 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते हैं। ऐसे में कम या अस्थिर बीमा कवर बड़ी आर्थिक परेशानी पैदा कर सकता है।

उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट पॉलिसी में बीमा राशि भी अक्सर कंपनी के बजट के हिसाब से तय होती है। शाह ने साफ कहा, “मैं नहीं चाहूंगा कि मेरे अस्पताल का बिल मेरे HR के नियंत्रण में हो।”

भविष्य की सुरक्षा के लिए पहले से करें प्लानिंग

शाह की सलाह है कि हेल्थ इंश्योरेंस को सिर्फ नौकरी से मिलने वाली सुविधा के तौर पर नहीं देखना चाहिए। रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस को समय रहते लेना जरूरी है, ताकि भविष्य में स्वास्थ्य समस्या या नौकरी में बदलाव के दौरान सुरक्षा बनी रहे।

उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति 10 से 15 साल बाद आने वाले क्लेम के लिए अच्छी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी चाहता है तो उसकी तैयारी आज से शुरू करनी होगी।

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