Budget 2028: खाद की सब्सिडी में 20% तक बढ़ोतरी की तैयारी, ₹3 लाख करोड़ के पार जा सकता है खर्च

केंद्र सरकार FY28 के बजट में खाद की सब्सिडी बढ़ाने पर विचार कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल और सप्लाई की दिक्कतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। मौजूदा वित्त वर्ष में सब्सिडी का खर्च ₹3 लाख करोड़ के पार जा सकता है। आखिर इसकी वजह क्या है?

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In Short

  • FY28 के बजट में खाद की सब्सिडी के लिए 20% तक ज्यादा रकम रखने पर विचार
  • चालू वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का खर्च ₹3 लाख करोड़ के पार जाने की उम्मीद
  • - यूरिया की 45 किलो बोरी पर सब्सिडी का बोझ ₹1,350 से बढ़कर ₹2,775 हुआ

By Gaurav Kumar:

केंद्र सरकार अगले साल के बजट यानी FY28 में खाद पर मिलने वाली सब्सिडी बढ़ाने की तैयारी कर रही है। शुरुआती चर्चा में इसके लिए मौजूदा आवंटन से 20% तक ज्यादा रकम रखने पर विचार किया जा रहा है। इसकी वजह दुनिया में खाद और ईंधन की बढ़ती कीमतें और सप्लाई में आ रही रुकावटें हैं। ऐसे में सरकार के सामने किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने और बढ़ते खर्च को संभालने की चुनौती है।

मौजूदा साल में ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा हो सकता है खर्च

सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में खाद की सब्सिडी के लिए ₹1.70 लाख करोड़ रखे थे। हालांकि, अब यह खर्च ₹3 लाख करोड़ के पार जाने की उम्मीद है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस रकम का 65% से ज्यादा हिस्सा पहले ही इस्तेमाल हो चुका है। खाद विभाग ने इस बढ़ते खर्च की जानकारी वित्त मंत्रालय को दे दी है। साथ ही, चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान में सब्सिडी का आवंटन 100% बढ़ाने की मांग भी की है।

FY28 के बजट में 20% तक अतिरिक्त रकम रखने पर विचार

सरकार FY28 के बजट में खाद की सब्सिडी के लिए अतिरिक्त रकम का इंतजाम करने पर विचार कर रही है। शुरुआती चर्चा के मुताबिक, मौजूदा आवंटन से 20% तक ज्यादा रकम का बफर रखा जा सकता है। इसका मकसद दुनिया में खाद और ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होने पर खर्च के दबाव को संभालना है। सरकारी सूत्रों ने साफ किया है कि यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार को किसी नए युद्ध जैसी स्थिति का अंदेशा है। अंतिम फैसला बजट पर चर्चा और अंतरराष्ट्रीय कीमतों की स्थिति के आधार पर लिया जाएगा।

पश्चिम एशिया के संघर्ष से बढ़ा खाद की कीमतों पर दबाव

पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण खाद की सप्लाई प्रभावित हुई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ी हैं। इसके साथ ही अल नीनो (El Nino) से जुड़ी चिंताओं ने भी स्थिति को मुश्किल बनाया है। खाद बनाने और विदेश से मंगाने की लागत बढ़ने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। सरकार ईंधन और खाद, दोनों के लिए अतिरिक्त रकम का इंतजाम करने पर विचार कर रही है। हालांकि, खाद की बढ़ती लागत इस समय सरकार के लिए खास चिंता का विषय बनी हुई है।

भारत अपनी जरूरत की करीब 80% खाद करता है इंपोर्ट

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद की सप्लाई में आने वाली रुकावटों को लेकर चिंता जताई थी। म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि भारत अपनी जरूरत की करीब 80% खाद इंपोर्ट करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर सरकार इसका पूरा बोझ किसानों पर नहीं डाल सकती, क्योंकि देश में बहुत से किसान छोटे और बंटे हुए खेतों पर खेती करते हैं।

सीतारमण ने बताया कि जिस खाद की एक यूनिट विदेश से करीब ₹3,000 में आती है, उसे किसानों को लगभग ₹300 में दिया जाता है। बाकी करीब ₹2,700 का खर्च सरकार उठाती है। उन्होंने खाद की ढुलाई में आने वाली दिक्कतों, कंटेनर की कमी और शिपिंग इंश्योरेंस की बढ़ती लागत का भी जिक्र किया। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने खाद की ढुलाई में मदद करने के मकसद से एक अलग शिपिंग इमरजेंसी फंड भी बनाया है।

यूरिया और DAP पर सरकार का सब्सिडी खर्च तेजी से बढ़ा

खाद की बढ़ती लागत का असर सरकारी सब्सिडी पर भी दिख रहा है। सरकार के आकलन के मुताबिक, संघर्ष से पहले यूरिया की 45 किलो की बोरी पर सब्सिडी का बोझ ₹1,350 था, जो बढ़कर ₹2,775 हो गया। वहीं, DAP यानी डाई-अमोनियम फॉस्फेट की 50 किलो की बोरी पर सब्सिडी का बोझ ₹2,102 से बढ़कर ₹3,523 हो गया है। ये आंकड़े सालाना रबी कॉन्फ्रेंस में पेश किए गए सरकारी आकलन का हिस्सा थे।

DAP और सल्फर की कीमतों ने बढ़ाई परेशानी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में इंपोर्ट होने वाले DAP की कीमत संघर्ष से पहले 681 डॉलर प्रति टन थी, जो बढ़कर 940 डॉलर प्रति टन हो गई। वहीं, सल्फर की कीमत 532 डॉलर से दोगुनी होकर 1,050 डॉलर प्रति टन पहुंच गई। सल्फर फॉस्फेट वाली खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाला एक जरूरी कच्चा माल है। इसकी कीमत बढ़ने से खाद के उत्पादन और सप्लाई पर दबाव पड़ा है।

कॉम्प्लेक्स खाद का घरेलू उत्पादन 26% गिरा

संघर्ष के बाद देश में कॉम्प्लेक्स खाद का घरेलू उत्पादन पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 26% घट गया। इससे बाजार में सप्लाई की चुनौती और बढ़ गई। हालांकि, यूरिया के इंपोर्ट की कीमतें मई में अपने सबसे ऊंचे स्तर से नीचे आई हैं, लेकिन DAP, म्यूरेट ऑफ पोटाश और सल्फर की ऊंची कीमतें अब भी सरकार के सब्सिडी खर्च के लिए जोखिम बनी हुई हैं। ऐसे में FY28 के बजट में अतिरिक्त रकम रखने का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें किस दिशा में जाती हैं।

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