सेक्टोरल या थीमैटिक फंड: आपके पोर्टफोलियो के लिए कौन सा बेहतर?
लार्ज, मिड और स्मॉल कैप फंड से आगे निवेश के विकल्प तलाश रहे लोगों की नजर सेक्टोरल और थीमैटिक फंड पर हो सकती है। इनमें बेहतर रिटर्न की संभावना के साथ जोखिम भी जुड़ा है। एक्सपर्ट ने बताया है कि ऐसे फंड को पोर्टफोलियो में जगह देते समय किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

In Short
- थीमैटिक और सेक्टोरल फंड में निवेश के साथ अतिरिक्त जोखिम भी जुड़ा होता है।
- एक्सपर्ट के मुताबिक, थीमैटिक फंड को पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा नहीं बनाना चाहिए।
- ऐसे फंड में बेहतर रिटर्न के लिए सही समय पर एंट्री और एग्जिट को समझना बेहद जरूरी है।
लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप फंड से आगे जाकर ज्यादा रिटर्न की तलाश कर रहे निवेशकों के लिए थीमैटिक और सेक्टोरल फंड एक विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, इनमें निवेश करते समय ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है। बिजनेस टुडे के शो में सीनियर एंकर साक्षी बत्रा के सवालों का जवाब देते हुए मनीट्री पार्टनर्स के को-फाउंडर सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि, इन फंड्स को पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा बनाने के बजाय सीमित हिस्से के तौर पर देखना चाहिए। सही समय पर इनमें अच्छा रिटर्न मिल सकता है, लेकिन इनमें जोखिम भी ज्यादा रहता है।
पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा न बनाएं
सिद्धार्थ शर्मा का कहना है कि किसी भी थीमैटिक फंड को हमेशा पोर्टफोलियो के बाहरी या छोटे हिस्से के रूप में रखना चाहिए। इसे पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि इसके साथ अतिरिक्त जोखिम जुड़ा होता है।
थीमैटिक और सेक्टोरल फंड अलग-अलग मार्केट कैप वाली कंपनियों में निवेश कर सकते हैं, लेकिन इनका निवेश किसी खास सेक्टर, इंडस्ट्री या थीम के आसपास केंद्रित रहता है। यही वजह है कि किसी थीम में तेजी आने पर इन फंड्स में ज्यादा फायदा हो सकता है, लेकिन गिरावट आने पर नुकसान भी बड़ा हो सकता है।
निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता जरूरी
सिद्धार्थ शर्मा के मुताबिक, थीमैटिक फंड में निवेश का फैसला सिर्फ ज्यादा रिटर्न की उम्मीद देखकर नहीं करना चाहिए। इसके लिए निवेशक की जोखिम उठाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता थोड़ी ज्यादा है, तो वह अपने पोर्टफोलियो में थीमैटिक फंड को जगह देने पर विचार कर सकता है।
हालांकि, ऐसे निवेश में अनुशासन जरूरी है। किसी खास थीम में तेज उतार-चढ़ाव आने पर निवेशक को बिना सोचे-समझे भावनाओं में आकर फैसला करने से बचना होगा।
सही एंट्री और एग्जिट सबसे अहम
थीमैटिक फंड में सबसे बड़ी चुनौती सही समय पर निवेश करने और उससे बाहर निकलने की है। सिद्धार्थ शर्मा के मुताबिक, निवेशक या उसके एडवाइजर को यह समझना जरूरी है कि किसी थीम में कब एंट्री करनी है और कब एग्जिट करना है।
बाजार में लंबे करेक्शन के दौरान भी कुछ खास सेक्टर या थीम बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। ऐसे में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का मौका दिखाई दे सकता है, लेकिन ऐसी तेजी तेजी से पलट भी सकती है। इसलिए सही टाइमिंग काफी अहम हो जाती है।
एक्सपर्ट की मदद क्यों हो सकती है जरूरी?
कई रिटेल निवेशकों के लिए यह समझना आसान नहीं होता कि किसी सेक्टर या थीम का सही समय कब शुरू और खत्म हो रहा है। ऐसे में अगर निवेशक एंट्री और एग्जिट का फैसला खुद नहीं कर पा रहे हैं, तो वे किसी फाइनेंशियल एक्सपर्ट की मदद ले सकते हैं।
कुल मिलाकर, थीमैटिक और सेक्टोरल फंड वेल्थ बनाने में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इन्हें पोर्टफोलियो का मुख्य आधार बनाने के बजाय सीमित और रणनीतिक निवेश के तौर पर देखना चाहिए।