Mutual Fund में आपका पैसा कितना सुरक्षित? देश की 12 बड़ी कंपनियों की रिपोर्ट में खुलासा, Climate Risk पर उठे सवाल
म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों के लिए एक नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। देश की बड़ी फंड कंपनियों की Climate Risk से जुड़ी तैयारी पर गंभीर सवाल उठे हैं। कुछ कंपनियों ने सुधार किया है, लेकिन कई जरूरी मामलों में कमियां बरकरार हैं। जानिए निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है।

In Short
- देश की 12 बड़ी म्यूचुअल फंड कंपनियों का Climate Risk Analysis और Stress Testing में लगातार दूसरे साल जीरो स्कोर रहा।
- ये 12 कंपनियां देश के 80% से ज्यादा म्यूचुअल फंड एसेट्स मैनेज करती हैं, लेकिन किसी ने Financed Emissions का खुलासा नहीं किया।
- UTI AMC 12 अंकों के साथ पहले और SBI Funds Management 11 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने वाले निवेशक आमतौर पर रिटर्न और मार्केट के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देते हैं। लेकिन अब एक रिपोर्ट में निवेश से जुड़े ऐसे खतरे सामने आए हैं, जिनका सीधा संबंध क्लाइमेट चेंज से है। देश की बड़ी म्यूचुअल फंड कंपनियां इन खतरों को कितनी गंभीरता से ले रही हैं और निवेशकों के पैसे पर इसका क्या असर पड़ सकता है? नई रिपोर्ट में कई अहम बातें सामने आई हैं।
12 बड़ी कंपनियों का क्लाइमेट रिस्क टेस्ट में स्कोर जीरो
शुक्रवार को जारी क्लाइमेट रिस्क होराइजन्स (सीआरएच) की रिस्किंग अल्फा रिपोर्ट के दूसरे एडिशन के मुताबिक, देश की 12 बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) ने लगातार दूसरे साल क्लाइमेट सिनेरियो एनालिसिस और स्ट्रेस टेस्टिंग में जीरो स्कोर किया है।
ये कंपनियां देश के कुल म्यूचुअल फंड एसेट्स का 80% से ज्यादा मैनेज करती हैं। इसका मतलब है कि इन कंपनियों ने सार्वजनिक तौर पर यह नहीं दिखाया कि क्लाइमेट चेंज से उनके निवेश पर कितना असर पड़ सकता है।
कंपनियों के एमिशन्स पर भी जानकारी अधूरी
रिपोर्ट के मुताबिक, 12 में से सिर्फ 3 एएमसी अपने ऑपरेशंस से होने वाले वेरिफाइड एमिशन्स की जानकारी देती हैं। वहीं, 2 कंपनियों ने इन्हें घटाने के लिए समयसीमा तय की है।
हालांकि, किसी भी कंपनी ने अपने पोर्टफोलियो में शामिल कंपनियों के एमिशन्स यानी फाइनेंस्ड एमिशन्स की जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
10 कंपनियों की रैंकिंग में सुधार
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बदलाव भी दिखे हैं। 12 में से 10 कंपनियों ने पिछले साल के मुकाबले अपना ओवरऑल स्कोर सुधारा है, जबकि 2025 की तुलना में इस बार जांच के नियम ज्यादा सख्त थे।
20 में से कम से कम 10 अंक हासिल करने वाली कंपनियों की संख्या 3 से बढ़कर 7 हो गई है। यह सुधार मुख्य रूप से बोर्ड ओवरसाइट, स्टीवर्डशिप और बीआरएसआर डिस्क्लोजर्स में आया है।
सभी 12 कंपनियों के पास अब स्टीवर्डशिप कोड और वोटिंग पॉलिसी है। इनमें 11 के पास ईएसजी स्क्रीनिंग पॉलिसी और 9 के पास ग्लोबल रिस्पॉन्सिबल इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव्स की फुल मेंबरशिप है।
यूटीआई सबसे आगे, एसबीआई दूसरे नंबर पर
यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी ने 12 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया। पिछले साल इसका स्कोर 9 था। एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट 11 अंकों के साथ दूसरे नंबर पर रही।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, एचडीएफसी, निप्पॉन लाइफ इंडिया, कोटक महिंद्रा और डीएसपी को 10-10 अंक मिले।
एक्सिस, मिराए एसेट, टाटा और बंधन ने अपने स्कोर में 3-3 अंकों का सुधार किया। बंधन का स्कोर जीरो से ऊपर पहुंचा, जबकि एक्सिस का स्कोर 5 से बढ़कर 8 हो गया।
कोल पॉलिसी पर सबसे बड़ा सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, 12 में से 7 कंपनियां ईएसजी या सस्टेनेबिलिटी-थीम्ड फंड्स ऑफर करती हैं। इसके बावजूद किसी ने भी अपने सभी फंड्स पर लागू होने वाली कोल पॉलिसी सार्वजनिक नहीं की है।
सिर्फ एक ईएसजी स्कीम में कोल एक्सक्लूजन है, लेकिन उसकी सीमा और शर्तें स्पष्ट नहीं हैं।
SEBI के नियमों में क्या कमी?
रिपोर्ट बताती है कि SEBI के ईएसजी फंड फ्रेमवर्क में फॉसिल फ्यूल में निवेश की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है। कुछ ईएसजी फंड्स में कोयले से जुड़ी कंपनियों के शेयर भी शामिल हैं।
रिपोर्ट की लेखिका और सीआरएच की सस्टेनेबल फाइनेंस एनालिस्ट स्नेहा यादव के मुताबिक, SEBI के नियमों से पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन ईएसजी फंड्स को यह ज्यादा साफ बताना होगा कि वे किन कंपनियों में निवेश नहीं करेंगे और इसके लिए क्या सीमाएं तय हैं।