भारत क्यों बन रहा ग्लोबल कंपनियों की नई पसंद? सप्लाई चेन से लेकर Ease of Doing Business तक पूरी तस्वीर

कोविड चिप शॉर्टेज टैरिफ और युद्धों ने ग्लोबल कंपनियों की रणनीति बदल दी है। अब वे सिर्फ कम लागत नहीं बल्कि मजबूत सप्लाई चेन भी चाहती हैं। भारत मैन्युफैक्चरिंग के नए विकल्प के रूप में उभर रहा है हालांकि Ease of Doing Business और Cost of Doing Business को लेकर कुछ चुनौतियां अभी बाकी हैं।

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By Gaurav Kumar:

दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए भारत अब सिर्फ बड़ा बाजार नहीं रह गया है। कोविड, चिप शॉर्टेज, टैरिफ और युद्ध जैसे संकटों ने कंपनियों को यह समझाया है कि कारोबार में सिर्फ कम लागत जरूरी नहीं, बल्कि सप्लाई चेन का मजबूत और सुरक्षित होना भी उतना ही अहम है। इसी वजह से कंपनियां अब अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस के लिए नए विकल्प तलाश रही हैं और भारत इस बदलाव में मजबूत दावेदार बनकर उभरा है। हालांकि निवेश बढ़ाने से पहले कंपनियां भारत में कारोबार करने की प्रक्रिया और लागत को भी ध्यान से देख रही हैं।

संकटों के बाद बदली कंपनियों की सोच

पिछले करीब सात वर्षों में दुनिया ने एक के बाद एक कई बड़े झटके देखे हैं। कोविड के बाद चिप शॉर्टेज, टैरिफ और अलग-अलग युद्धों ने ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर डाला। इसी अनुभव के बाद कंपनियों ने अपने बिजनेस मॉडल में रेजिलिएंस और सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन को ज्यादा अहमियत देना शुरू किया है। अब कंपनियां एक ही देश या एक ही सप्लायर पर ज्यादा निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग सोर्स तैयार करना चाहती हैं।

भारत के पास क्षमता से लेकर बाजार तक कई फायदे

भारत कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग के लिए कई तरह के फायदे देता है। यहां बड़ी संख्या में लोग उपलब्ध हैं, अलग-अलग स्किल वाले मैनपावर की कमी नहीं है और घरेलू बाजार भी लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा भारत की कैपेबिलिटी और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी भी कंपनियों को आकर्षित कर रही है। इसी वजह से कई कंपनियां अपने पुराने मैन्युफैक्चरिंग बेस के विकल्प के तौर पर भारत को देख रही हैं।

पश्चिम एशिया और यूक्रेन संकट के बाद बढ़ी पूछताछ

बातचीत में बताया गया कि पश्चिम एशिया और यूक्रेन संकट के बाद भारत को लेकर कंपनियों की इन्क्वायरी बढ़ी है। खास तौर पर पूर्वी देशों और यूरोप की कंपनियां भारत को एक अच्छे सोर्स के रूप में देख रही हैं। अमेरिकी कंपनियों की ओर से यह रुझान उतना मजबूत नहीं है क्योंकि वहां घरेलू बाजार में ही अच्छी ग्रोथ दिखाई दे रही है।

Ease of Doing Business में अभी सुधार की जरूरत

भारत को लेकर कंपनियों की सबसे बड़ी चिंताओं में Ease of Doing Business और Cost of Doing Business शामिल हैं। पावर कॉस्ट और लॉजिस्टिक्स कॉस्ट में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन जमीन से जुड़ी प्रक्रिया अभी भी कॉम्प्लेक्स है। लेबर लॉ से निपटना भी आसान नहीं है और अलग-अलग राज्यों में अप्रूवल प्रोसेस अलग होने से कई बार ज्यादा समय लग जाता है।

बड़े निवेशकों को मिल सकती है सरकारी मदद

भारत के पक्ष में सबसे बड़ी बात इसकी जियोपॉलिटिकल स्टेबिलिटी और अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से उपलब्ध मैनपावर है। कुछ राज्यों में काम करने का सिस्टम पहले से काफी बेहतर हुआ है। बड़े निवेश के मामले में कंपनियां केंद्र सरकार की मदद भी ले सकती हैं। लेकिन भारत में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करना तुरंत स्विच ऑन करने जैसा काम नहीं है। कंपनियों को सही राज्य चुनने, प्रक्रिया समझने और लंबे समय की रणनीति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत होगी। LIVE session, Sen

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