नेट जीरो की रेस में वेदांता आगे! 1 अरब डॉलर के निवेश से घटाया 36 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन
वेदांता ने नेट जीरो लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए बड़ा निवेश किया है। कंपनी के कदमों से कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी आई है और रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। आखिर कैसे माइनिंग कंपनी बदल रही है अपनी रणनीति और क्यों मेटल सेक्टर में इसे अहम माना जा रहा है पढ़ें पूरी कहानी।

In Short
- वेदांता ने नेट जीरो ट्रांजिशन के लिए पिछले पांच साल में 1 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश किया
- कंपनी ने FY2021 से अब तक करीब 36 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन घटाने का दावा किया
- रिन्यूएबल एनर्जी इस्तेमाल में 52% की बढ़ोतरी के साथ कंपनी 2030 तक 2.5 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य लेकर चल रही है
माइनिंग कंपनी वेदांता ने नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में बड़ा निवेश किया है। कंपनी ने पिछले पांच साल में रिन्यूएबल एनर्जी, लो कार्बन फ्यूल, एनर्जी एफिशिएंसी और टेक्नोलॉजी आधारित डिकार्बोनाइजेशन के लिए 1 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं। कंपनी का कहना है कि इन कदमों से FY2021 से अब तक करीब 36 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिली है।
वेदांता के अनुसार उसकी मेटल्स और माइनिंग प्रोडक्शन में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की इंटेंसिटी FY2020-21 के बेसलाइन के मुकाबले करीब 14% कम हुई है। कंपनी अब अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ा रही है और इसी दिशा में कई नए कदम उठा रही है।
रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल 52% बढ़ा
वेदांता की रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल FY2025-26 में सालाना आधार पर 52% बढ़कर 4 बिलियन यूनिट यानी 400 करोड़ यूनिट तक पहुंच गया। कंपनी के मुताबिक यह मात्रा करीब 3 करोड़ भारतीय घरों की सालाना बिजली खपत के बराबर है।
कंपनी के पास अभी करीब 2,000 मेगावाट की इंस्टॉल्ड और कॉन्ट्रैक्टेड रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी है। वेदांता का लक्ष्य 2030 तक 2.5 गीगावाट की राउंड द क्लॉक रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी तैयार करना है।
क्लीन एनर्जी बदलाव में मेटल्स की बढ़ेगी मांग
मेटल्स और माइनिंग सेक्टर में एनर्जी का इस्तेमाल काफी ज्यादा होता है, इसलिए रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ना कंपनियों के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ लागत को बेहतर बनाने का तरीका भी है।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट नॉन फॉसिल फ्यूल आधारित पावर कैपेसिटी का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा देश 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।
वेदांता का मानना है कि क्लीन एनर्जी और इलेक्ट्रिफिकेशन की बढ़ती जरूरतों के कारण कॉपर, एल्युमिनियम, जिंक, सिल्वर और स्टील जैसे मेटल्स की मांग आने वाले समय में बढ़ सकती है।
लो कार्बन प्रोडक्ट्स पर भी कंपनी का फोकस
वेदांता अपनी कंपनियों के जरिए लो कार्बन प्रोडक्ट्स भी तैयार कर रही है। इसमें वेदांता एल्युमिनियम के रेस्टोरा और रेस्टोरा अल्ट्रा और हिंदुस्तान जिंक का इकोजेन शामिल हैं।
कंपनी के मुताबिक FY2025-26 में इकोजेन का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों ने करीब 8,268 टन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद की।
AI और ऑटोमेशन से बढ़ा रही एनर्जी एफिशिएंसी
रिन्यूएबल एनर्जी के अलावा वेदांता अपने ऑपरेशंस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI, ऑटोमेशन, इंडस्ट्रियल इंटरनेट ऑफ थिंग्स और एडवांस्ड एनालिटिक्स जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है।
इन टेक्नोलॉजी की मदद से कंपनी इंडस्ट्रियल प्रोसेस को बेहतर बना रही है, ऊर्जा की खपत को कम कर रही है और अपने ऑपरेशंस को ज्यादा एफिशिएंट बनाने की कोशिश कर रही है।
वेदांता की नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन प्रिया अग्रवाल हेब्बार ने कहा कि क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन के लिए टिकाऊ मटेरियल और टिकाऊ ऑपरेशंस दोनों जरूरी हैं। कंपनी का कहना है कि उसकी रणनीति सिर्फ उत्सर्जन कम करने तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के एनर्जी ट्रांजिशन के लिए जरूरी मटेरियल की सप्लाई बढ़ाने पर भी केंद्रित है।