रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 100% टैरिफ की तलवार, अमेरिका के सख्त रुख से बढ़ा तनाव

रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका और भारत के बीच तनाव की चर्चा बढ़ गई है। नए अमेरिकी कानून में टैरिफ लगाने का प्रावधान है। वहीं, भारत का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा और किफायती तेल उसकी प्राथमिकता है। जानिए इस पूरे मामले में क्या है विवाद और असर।

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In Short

  • अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने वाला कानून बनाया है।
  • भारत ने कहा, ऊर्जा सुरक्षा और सस्ता तेल उसकी बड़ी प्राथमिकता है।
  • भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है।

By Sonam:

भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर व्यापार और विदेश नीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इसकी वजह रूस और ईरान के साथ भारत के संबंध बताए जा रहे हैं। अमेरिकी संसद ने हाल ही में ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ पारित किया है, जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हस्ताक्षर कर चुके हैं।

इस कानून के तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। जानकारों के मुताबिक, इस कानून का मुख्य निशाना भारत और चीन हो सकते हैं।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की नजर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से ज्यादा हिस्सा आयात से पूरा करता है।

भारत का कहना है कि उसके लिए ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों को किफायती दरों पर ऊर्जा उपलब्ध कराना प्राथमिकता है। भारत अमेरिका से सैन्य उपकरण, फ्रांस से राफेल विमान, रूस से कच्चा तेल और चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स अपनी जरूरतों के हिसाब से खरीदता है।

चीन से मिली सीख के बाद भारत पर सख्त रुख?

जानकारों का मानना है कि अमेरिका का सख्त रुख सिर्फ रूस-यूक्रेन नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत के आर्थिक विकास को लेकर चिंता भी हो सकती है।

अमेरिका के उप-विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने मार्च में कहा था कि अमेरिका भारत के साथ वह गलती नहीं दोहराएगा, जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी।

दरअसल, 1970 और 1990 के दशक में अमेरिका ने चीन के लिए बड़े बाजार खोले, टेक्नोलॉजी और निवेश का रास्ता आसान किया। इसके बाद चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। 1980 में चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका की तुलना में करीब 7% थी, जो 2025 तक बढ़कर 19.5 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई।

वहीं, ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी भी 1990 के 3% से बढ़कर 2023 में 31.8% हो गई।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर

भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए रखता है।

भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के मुताबिक, 1.4 अरब भारतीयों के लिए ऊर्जा एक महत्वपूर्ण जरूरत है और भारत इसी आधार पर अपनी रणनीति बनाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जुलाई 2026 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 52% बताई गई है।

क्या टैरिफ का दबाव असर करेगा?

1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाए थे। इनमें सैन्य बिक्री, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कर्ज से जुड़े प्रतिबंध शामिल थे।

हालांकि, भारत ने अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था के दम पर उस स्थिति का सामना किया। बाद में 2001 में अमेरिका ने प्रतिबंध हटा दिए और 2008 में दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु समझौता हुआ।

अब 100% टैरिफ की संभावना के बीच भारत और अमेरिका के रिश्तों पर असर को लेकर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों देशों की साझेदारी परस्पर हितों और सम्मान के आधार पर आगे बढ़ सकती है।

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