अमेरिका के नए बिल से भारत की बढ़ी चिंता, रूस से सस्ता तेल खरीदना पड़ सकता है भारी
अमेरिका में रूस से जुड़े नए सैंक्शंस बिल ने इंडिया की चिंता बढ़ा दी है। बिल में डोनाल्ड ट्रंप को रशियन ऑयल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की पावर दी गई है। लेकिन इंडिया पर इसका असर कब और कितना होगा, यह ट्रंप के फैसले पर डिपेंड करेगा।

In Short
- अमेरिकी सीनेट ने रूस सैंक्शंस बिल को 86-11 वोट से पास किया, जिसमें 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की पावर शामिल है।
- भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया रूसी तेल-गैस खरीदने वाले उन देशों में हैं, जिन पर कार्रवाई का खतरा है।
- भारत पर टैरिफ लगना अभी तय नहीं है, क्योंकि अंतिम फैसला डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में रहेगा।
अमेरिका में रूस से जुड़े नए सैंक्शंस बिल ने भारत और चीन समेत उन देशों की चिंता बढ़ा दी है, जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की ताकत देने की बात कही गई है। अब सबसे बड़ा सवाल इसके भारत पर असर को लेकर है।
भारत पर सीधे नहीं लगेगा 100% टैरिफ
अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान पर सख्त कार्रवाई वाले इस बाइपार्टिसन बिल को 86-11 वोट से पास कर दिया है। बिल में ट्रंप को रूस का तेल और गैस खरीदने वाले टॉप फाइव इंपोर्टर्स में शामिल देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की ताकत दी गई है। फिलहाल चीन, भारत, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया इसके दायरे में आते हैं। हालांकि, टैरिफ लगना ऑटोमैटिक नहीं होगा। ट्रंप अमेरिकी नेशनल इंटरेस्ट के आधार पर इसे लागू करने, टालने, हटाने या बदलने का फैसला कर सकते हैं।
पहले 500% टैरिफ का था प्रपोजल
सीनेट से पास हुआ मौजूदा बिल पहले के प्रपोजल के मुकाबले कम सख्त है। पुराने प्रपोजल में रूस की एनर्जी खरीदने वाले देशों के सामान पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। मौजूदा बिल में अधिकतम टैरिफ 100 फीसदी रखा गया है। अब यह बिल अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा, जिसकी बैठक 31 अगस्त से दोबारा शुरू होगी।
रूस को निशाना बनाने की वजह क्या है?
वॉशिंगटन का कहना है कि दूसरे देश जब रूस से एनर्जी खरीदते हैं तो इससे मॉस्को को रेवेन्यू मिलता है और यूक्रेन में चल रही जंग को जारी रखने में मदद मिलती है। बिल में रूस के लीडर्स, अधिकारियों, ओलिगार्क्स और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस पर भी सैंक्शंस लगाने का प्रपोजल है। इसके अलावा 1996 के ईरान सैंक्शंस एक्ट को 2031 तक बढ़ाने और ईरान के एनर्जी, शिपिंग और फाइनेंशियल सेक्टर्स पर कार्रवाई बढ़ाने की बात भी कही गई है।
लिंडसे ग्राहम के नाम पर क्यों है बिल?
इस बिल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था। ग्राहम की 11 जुलाई को कीव की यात्रा के बाद अचानक मौत हो गई थी। इसके बाद दोनों पार्टियों के सांसदों ने यूक्रेन के समर्थन में उनके काम को देखते हुए इस बिल को आगे बढ़ाया। इसी वजह से इसका नाम लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शन्ड रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 रखा गया है।
अमेरिका में भी बिल को लेकर विरोध
कुछ डेमोक्रेटिक सांसदों ने ट्रंप को मिलने वाली टैरिफ पावर पर सवाल उठाए हैं। ग्रेगरी मीक्स और डॉन बेयर का कहना है कि इससे राष्ट्रपति को बहुत ज्यादा टैरिफ अथॉरिटी मिल जाएगी, जिसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। उनका कहना है कि इससे रूस को जवाब देने के बजाय अमेरिकियों पर ही महंगे सामान और ट्रेड वॉर का बोझ पड़ सकता है।
भारत के लिए क्या बदल सकता है?
भारत 2022 में रूस-यूक्रेन वॉर शुरू होने के बाद से डिस्काउंटेड रूसी क्रूड के बड़े बायर्स में शामिल रहा है। अगर ट्रंप टैरिफ लगाने का फैसला करते हैं तो भारतीय एक्सपोर्टर्स पर दबाव बढ़ सकता है। इंजीनियरिंग गुड्स, फार्मास्युटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे सेक्टर्स प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि डिफेंस, टेक्नोलॉजी और इंडो-पैसिफिक कोऑपरेशन जैसे भारत-अमेरिका संबंधों के दूसरे पहलू भी ट्रंप के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही नई दिल्ली पर रूसी एनर्जी पर अपनी डिपेंडेंस कम करने का दबाव भी बढ़ सकता है।
बिल अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास जाएगा। अगर यह वहां भी पास हो जाता है तो रूस और ईरान पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका के पास एक बड़ा आर्थिक हथियार होगा, जिसका असर भारत और चीन जैसे देशों पर भी पड़ सकता है।