TCS, Infosys, Wipro समेत बड़ी IT कंपनियां घटा रही हैं बेंच स्ट्रेंथ, स्किल्स पर होगा पूरा फोकस
भारत की बड़ी आईटी कंपनियों में कर्मचारियों को प्रोजेक्ट मिलने का तरीका तेजी से बदल रहा है। एआई, नई स्किल्स और जरूरत के हिसाब से हायरिंग के कारण बेंच स्ट्रेंथ घटाई जा रही है। लेकिन क्या इसका असर नौकरियों पर पड़ेगा या कर्मचारियों को नए रोल मिलेंगे? पूरी कहानी समझिए।

In Short
- टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएलटेक, विप्रो और टेक महिंद्रा की बेंच स्ट्रेंथ FY27 तक घटकर करीब 8-10 फीसदी रह सकती है।
- आईटी कंपनियां अब बड़ी संख्या में पहले से हायरिंग करने के बजाय एआई, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी और डेटा एनालिटिक्स जैसी स्पेशलाइज्ड स्किल्स पर फोकस कर रही हैं।
- बेंच स्ट्रेंथ कम होने का मतलब सीधे बड़े लेऑफ नहीं है, क्योंकि कंपनियां कर्मचारियों को अपस्किल और रीस्किल करके नए प्रोजेक्ट्स में लगाने की कोशिश कर रही हैं।
भारत की बड़ी आईटी कंपनियां अब ऐसे कर्मचारियों की संख्या कम करने की तैयारी कर रही हैं, जो कंपनी के पेरोल पर तो हैं, लेकिन किसी एक्टिव क्लाइंट प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर रहे। इस व्यवस्था को आईटी सेक्टर में ‘बेंच’ कहा जाता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बेहतर वर्कफोर्स प्लानिंग और जरूरत के हिसाब से हायरिंग के कारण कंपनियां अब बड़ी स्टैंडबाय टीम रखने से बच रही हैं। इसी बदलाव का असर आने वाले समय में बेंच स्ट्रेंथ, कर्मचारियों की ट्रेनिंग और नई हायरिंग पर दिखाई देगा।
FY27 तक 8-10 फीसदी रह सकती है बेंच स्ट्रेंथ
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएलटेक, विप्रो और टेक महिंद्रा जैसी बड़ी आईटी कंपनियों की औसत बेंच स्ट्रेंथ पिछले तीन साल में घटकर सिंगल डिजिट या अधिकतम 12 फीसदी रह गई है।
टीमलीज डिजिटल के अनुमान के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2027 तक यह और घटकर करीब 8-10 फीसदी रह सकती है। यह प्री-एआई दौर के मुकाबले काफी कम है, जब कंपनियां आमतौर पर 20-30 फीसदी कर्मचारियों को बेंच पर रखती थीं।
अब जरूरत के हिसाब से हो रही हायरिंग
पहले आईटी कंपनियां भविष्य में प्रोजेक्ट मिलने की उम्मीद में बड़ी संख्या में कर्मचारियों की हायरिंग कर लेती थीं। अब यह तरीका बदल गया है। कंपनियां अब डिमांड के हिसाब से भर्ती कर रही हैं और एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी और डेटा एनालिटिक्स जैसी स्पेशलाइज्ड स्किल्स वाले लोगों को प्राथमिकता दे रही हैं।
टीमलीज डिजिटल की सीईओ नीति शर्मा के मुताबिक, कंपनियां एआई, बेहतर डिमांड फोरकास्टिंग और वर्कफोर्स प्लानिंग के जरिए एम्प्लॉयी यूटिलाइजेशन बढ़ा रही हैं। कर्मचारियों के बेंच पर रहने का समय भी पहले के 45-60 दिनों से घटकर करीब 30-45 दिन रह गया है।
रेवेन्यू और मार्जिन पर कंपनियों का फोकस
धीमी रेवेन्यू ग्रोथ और एआई से बढ़ी प्रोडक्टिविटी के बीच कंपनियां कर्मचारियों का बेहतर इस्तेमाल करना चाहती हैं। कोटक नियो के सुमित पोखरना के मुताबिक, कंपनियां ऐसी वर्कफोर्स चाहती हैं, जो एआई-स्किल्ड हो और जिसे जल्दी किसी प्रोजेक्ट पर लगाया जा सके।
उनका कहना है कि आईटी कंपनियों का यूटिलाइजेशन रेट पहले ही काफी ऊंचा है। ऐसे में जरूरत से ज्यादा कर्मचारियों को बनाए रखना कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
क्या इससे बढ़ सकती हैं छंटनियां?
बेंच स्ट्रेंथ घटने का मतलब सीधे तौर पर बड़े पैमाने पर लेऑफ नहीं है। कंपनियां फिलहाल कर्मचारियों को अपस्किल और रीस्किल करने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, ताकि उन्हें नई टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रोजेक्ट्स में लगाया जा सके।
हालांकि, जिन कर्मचारियों को नई भूमिका में तैनात करना संभव नहीं होगा, वहां कंपनियां एक्सेस कैपेसिटी कम कर सकती हैं। एक्सफीनो के सीईओ फ्रांसिस पदमदान के मुताबिक, पोस्ट-पैंडेमिक हायरिंग के दौरान बनी ज्यादातर अतिरिक्त कैपेसिटी पहले ही कम की जा चुकी है।
हायरिंग जारी रहेगी, लेकिन स्किल्स बदलेंगी
आईटी कंपनियां हायरिंग बंद नहीं कर रही हैं, लेकिन अब फोकस स्पेशलाइज्ड टैलेंट पर होगा। टीसीएस प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग पर निवेश कर रही है, जबकि इंफोसिस आने वाले वर्षों में करीब 6,000 फ्रंटियर इंजीनियर्स की भर्ती करने की योजना बना रही है।
एचसीएलटेक स्पेशलाइज्ड फ्रेशर्स पर फोकस कर रही है। टेक महिंद्रा भी बिजनेस विजिबिलिटी बेहतर होने पर फ्रेशर हायरिंग दोबारा शुरू कर सकती है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक विप्रो ने अभी ऐसी किसी योजना की घोषणा नहीं की है।
कुल मिलाकर, आईटी सेक्टर अब बड़ी बेंच रखने के बजाय स्किल्स, तेजी से डिप्लॉयमेंट और लगातार अपस्किलिंग पर ज्यादा जोर दे रहा है।