सऊदी पाइपलाइन बंद, कच्चे तेल के दाम 128 डॉलर पार; भारत के सामने रूस समेत इन देशों से तेल लेने की चुनौती
सऊदी पाइपलाइन बंद होने और तेल रूट पर बढ़ते दबाव के बीच भारत अपनी क्रूड ऑयल सप्लाई रणनीति पर काम कर रहा है। रूस से आने वाले तेल की भूमिका क्यों अहम हो सकती है और महंगे कच्चे तेल का असर भारत पर कैसे पड़ सकता है, जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर।

In Short
- सऊदी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद होने के बाद भारत कच्चे तेल की सप्लाई के लिए नए विकल्पों पर ध्यान दे रहा है।
- अगस्त में रूस से भारत का तेल आयात जुलाई के रिकॉर्ड स्तर से 26 फीसदी कम हुआ, फिर भी रूस अहम सप्लायर बना हुआ है।
- महंगे कच्चे तेल, फ्रेट और इंश्योरेंस लागत से भारत के आयात बिल और महंगाई पर असर पड़ सकता है।
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन बंद होने से भारत अपनी कच्चे तेल की सप्लाई को और ज्यादा डायवर्सिफाई कर सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस स्थिति में रूस से आने वाला कच्चा तेल भारत की जरूरतों को पूरा करने में और अहम भूमिका निभा सकता है। अगस्त में रूस से भारत का तेल आयात जुलाई के रिकॉर्ड स्तर से 26 फीसदी घट गया था।
टैंकर डेटा के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में रूस से तेल आयात में गिरावट की वजह अमेरिका की टैरिफ नीति का दबाव, यूक्रेन की ओर से किए गए ड्रोन हमले और चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा रही। हालांकि, रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना हुआ है।
रूस के साथ-साथ दूसरे देशों से भी बढ़ेगा आयात
रूस से सप्लाई घटने के बाद भारत के लिए वेनेजुएला, ब्राजील, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इराक, अंगोला और नाइजीरिया जैसे देशों से तेल आयात के विकल्प बढ़े हैं।
मैरिटाइम इंटेलिजेंस कंपनी Kpler के सीनियर मैनेजर (मॉडलिंग) सुमित रितोलिया के मुताबिक, भारत अब रूस, अमेरिका, पश्चिमी अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य गैर-मध्य पूर्वी स्रोतों से तेल सप्लाई बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे सकता है, ताकि किसी एक रूट पर निर्भरता कम हो।
उन्होंने कहा कि रूस से आने वाला कच्चा तेल खास तौर पर महत्वपूर्ण बना रहेगा। कई तेल रूट पर दबाव के बीच ब्लैक सी और बाल्टिक रूट से आने वाले रूसी बैरल सप्लाई सिक्योरिटी के लिहाज से ज्यादा अहम हो जाते हैं।
महंगे कच्चे तेल से बढ़ सकती है परेशानी
भारत के लिए सिर्फ कच्चे तेल की उपलब्धता ही चुनौती नहीं है, बल्कि इसकी बढ़ती कीमत भी चिंता का कारण बन रही है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के मुताबिक, 14 सितंबर 2026 को इंडियन क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत 128.70 डॉलर प्रति बैरल रही। यह पिछले हफ्ते 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई थी, जो इस साल जुलाई के बाद सबसे ऊंचा स्तर है।
सऊदी अरब ने पिछले हफ्ते ड्रोन हमले के बाद एक प्रमुख तेल पाइपलाइन को बंद कर दिया, वहीं यमन के हाउती विद्रोहियों ने लाल सागर के प्रवेश द्वार की सुरक्षा करने वाले रणनीतिक द्वीप पर कब्जा कर लिया। इससे भारत के रिफाइनर्स के लिए तेल पहुंचाने के विकल्प सीमित हो गए हैं।
तेल महंगा होने का असर भारत पर
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की रणनीति सप्लाई में रुकावट के जोखिम को कम कर सकती है, लेकिन जब कई बड़े तेल रूट एक साथ प्रभावित होते हैं तो बढ़ी हुई लागत से पूरी तरह बचना मुश्किल होता है।
महंगे कच्चे तेल, ज्यादा फ्रेट चार्ज, इंश्योरेंस लागत और लंबी दूरी के कारण भारत का तेल आयात बिल बढ़ सकता है। इससे चालू खाते पर दबाव, रुपये पर असर और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।
इसके अलावा अगर घरेलू ईंधन कीमतों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल और बढ़ती ट्रांसपोर्ट लागत का पूरा असर नहीं दिखाया जाता है, तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन और सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी दबाव पड़ सकता है।