रुपये की गिरती कीमत रोकने के लिए RBI का बड़ा दांव! NRI से आए रिकॉर्ड $127 अरब, जानें कैसे हुआ फायदा
रुपये में तेज गिरावट के बीच भारत ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों की मदद से रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा जुटाई। RBI की खास व्यवस्था के बाद बैंकों के पास FCNR डिपॉजिट में 127 अरब डॉलर आए। दूसरी विदेशी मुद्रा उधारी जोड़ने पर कुल रकम 136 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच गई।

In Short
- रुपये पर दबाव घटाने के लिए RBI ने FCNR डिपॉजिट को बढ़ावा दिया
- भारतीय बैंकों ने रिकॉर्ड 127 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जमा जुटाई
- उम्मीद 80 अरब डॉलर की थी लेकिन कुल विदेशी फंडिंग 136 अरब डॉलर के पार पहुंची
भारत ने रुपये में तेज गिरावट को थामने के लिए इस बार विदेशों में रहने वाले भारतीयों यानी डायस्पोरा का सहारा लिया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार जून में भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए खास प्रोत्साहन दिया ताकि देश में डॉलर की आवक बढ़ाई जा सके और रुपये पर दबाव कम हो।
35 मिलियन भारतीयों से जुटाई विदेशी मुद्रा
भारत के करीब 35 मिलियन लोग विदेशों में रहते हैं। सरकार और रिजर्व बैंक ने इसी बड़े नेटवर्क के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की रणनीति अपनाई। इससे पहले 2013 के टेपर टैंट्रम के दौरान भी ऐसी ही रणनीति इस्तेमाल की गई थी। उस समय बैंकों ने करीब 26 अरब डॉलर जुटाए थे, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने में मदद मिली थी।
इस बार बैंकरों को शुरुआत में उम्मीद थी कि करीब 80 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जमा आ सकती है। लेकिन नतीजा इससे काफी आगे निकल गया।
रिकॉर्ड 127 अरब डॉलर की जमा
भारतीय बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा के रूप में रिकॉर्ड 127 अरब डॉलर जुटाए। दूसरी विदेशी मुद्रा वाली उधारी को भी शामिल कर लें तो इस योजना के जरिए कुल 136 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम आई।
इतनी बड़ी प्रतिक्रिया के बाद रिजर्व बैंक ने जमा की यह खास विंडो 31 अगस्त को ही बंद कर दी, जबकि पहले इसकी आखिरी तारीख 30 सितंबर रखी गई थी।
सितंबर की शुरुआत तक रुपया एशिया की दूसरी सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया था। विदेशी मुद्रा की इस आवक से रिजर्व बैंक को वैश्विक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा भी मिली।
आखिर कैसे काम करती थी स्कीम?
विदेशी मुद्रा जमा लेने पर बैंकों को एक्सचेंज रेट में बदलाव का जोखिम रहता है। आरबीआई ने Foreign Currency Non Resident यानी FCNR डिपॉजिट पर इस करेंसी हेजिंग का खर्च खुद उठाने की पेशकश की।
मान लीजिए विदेश में रहने वाला कोई भारतीय भारत के बैंक में 100000 डॉलर जमा करता है। वह इसी डिपॉजिट को गिरवी रखकर विदेश के किसी बैंक से इससे कई गुना बड़ी रकम उधार ले सकता था और उस पैसे को भी भारत में ट्रांसफर कर सकता था।
अगर डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज लोन के ब्याज से ज्यादा रहता तो निवेशक दोनों के अंतर से कमाई कर सकता था।
बैंकों को क्या फायदा हुआ?
भारत के बैंकिंग सिस्टम में पिछले दो साल से लोन की मांग के मुकाबले डिपॉजिट ग्रोथ कमजोर रही है। इस व्यवस्था से बैंकों को एनआरआई से डॉलर में नई फंडिंग मिली।
इससे महंगे शॉर्ट टर्म कर्ज पर बैंकों की निर्भरता कम हो सकती है और घरेलू डिपॉजिट जुटाने की होड़ भी घट सकती है। इसका असर कंपनियों के लिए कर्ज की लागत पर भी पड़ सकता है।
2025-26 में भारत में आने वाली रेमिटेंस 155 अरब डॉलर से ज्यादा रही थी। वहीं जब 5 जून को यह कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब पांच साल के अमेरिकी ट्रेजरी की यील्ड करीब 4.3 फीसदी थी, जबकि SBI समान अवधि के FCNR डिपॉजिट पर करीब 6 फीसदी तक ब्याज दे रहा था।