प्राइवेट अस्पतालों के कमरे का किराया 3-स्टार होटल से ज्यादा नहीं? संसदीय समिति की बड़ी सिफारिश
प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का बढ़ता खर्च लंबे समय से चिंता का विषय है। अब संसदीय समिति ने मरीजों के हित में कमरे के किराए और अस्पताल की बिलिंग को लेकर अहम सिफारिशें की हैं। समिति ने पारदर्शिता बढ़ाने और इलाज से पहले संभावित खर्च की जानकारी देने पर भी जोर दिया है।

In Short
- सुप्रीम कोर्ट अलग से इस बात की जांच कर रहा है कि क्या प्राइवेट अस्पतालों की दरें तय की जानी चाहिए.
- यह मामला 2020 की एक PIL से शुरू हुआ, जिसमें फीस को रेगुलेट करने की मांग की गई थी.
- केंद्र ने कोर्ट को बताया कि दरें तय करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सलाह-मशविरा ज़रूरी है.
प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च लगातार चर्चा में रहता है। अब स्वास्थ्य पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने अस्पतालों के कमरे के किराए को लेकर बड़ी सिफारिश की है। समिति का कहना है कि बड़े शहरों में किसी प्राइवेट अस्पताल के बेसिक कमरे का किराया उसके आसपास मौजूद तीन-स्टार होटलों के औसत किराए से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
यह सिफारिश ऐसे समय में सामने आई है जब सुप्रीम कोर्ट भी प्राइवेट अस्पतालों की फीस तय करने से जुड़े मामले पर विचार कर रहा है। कोर्ट के सामने सवाल है कि क्या प्राइवेट अस्पतालों के चार्ज को रेगुलेट किया जाना चाहिए और अगर ऐसा होता है तो इसकी व्यवस्था क्या होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा मामला
यह मामला साल 2020 में दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। 'वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ' की ओर से दाखिल इस याचिका में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट फ्रेमवर्क के तहत प्राइवेट अस्पतालों की फीस को रेगुलेट करने की मांग की जाती है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को राज्यों से बातचीत करने और अस्पतालों की दरों पर ठोस प्रस्ताव पेश करने का निर्देश देता है। केंद्र सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए कीमत तय करने की जिम्मेदारी राज्यों की है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने माना की ऐसा संतुलन होना चाहिए जिसमें अस्पतालों के चार्ज मरीजों के लिए बहुत ज्यादा न हों, लेकिन इतने कम भी न हों कि अस्पतालों के लिए काम करना आर्थिक रूप से मुश्किल हो जाए।
प्राइवेट अस्पतालों ने क्या कहा?
प्राइवेट अस्पतालों का कहना है कि उनकी सुविधाएं और सेवाएं अलग-अलग होती हैं, इसलिए कुछ कमरों की कीमत तय करने की आजादी अस्पतालों के पास रहनी चाहिए।
इंडिया टुडे के रिपोर्ट के मुताबिक एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ सदस्य और सलाहकार डॉ. अलेक्जेंडर थॉमस का कहना है कि प्राइवेट कमरे की दरें अस्पताल अपनी सुविधाओं के आधार पर तय कर सकते हैं। वहीं मरीजों के पास रेगुलर और ज्यादा किफायती कमरा चुनने का विकल्प भी रहता है।
बिलिंग में ज्यादा ट्रांसपेरेंसी की मांग
संसदीय समिति सिर्फ कमरे के किराए तक अपनी सिफारिश सीमित नहीं रखती। पैनल जरूरी जांच और इलाज से जुड़े चार्ज को रेगुलेट करने और अस्पतालों की फीस को ज्यादा पारदर्शी बनाने की भी बात करता है।
समिति चाहती है कि बड़ी मेडिकल प्रक्रिया या इलाज से पहले मरीज और उसके परिवार को संभावित खर्च की पूरी जानकारी दी जाए। इससे परिवार पहले से अपने खर्च का अंदाजा लगा सकता है और अचानक भारी बिल आने का जोखिम कम हो सकता है।
पैनल इंश्योरेंस वाले और बिना इंश्योरेंस वाले मरीजों से अलग-अलग कीमत वसूलने के मुद्दे की भी जांच की जरूरत बताता है। साथ ही, आईआरडीएआई से इस मामले पर खास ध्यान देने की सिफारिश करता है।