रियल एस्टेट पर युद्ध का साया! 2026 में 5.4 लाख घरों की डिलीवरी पर संकट, जानिए देरी की क्या है वजह

सप्लाई चेन में रुकावट, लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत और निर्माण सामग्री के महंगे होने से देशभर में 2026 में डिलीवर होने वाले करीब 5.40 लाख घरों की समय पर चाबी मिलना मुश्किल हो सकता है।

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By Gaurav Kumar:

अगर आप अपने नए घर की चाबी मिलने का इंतजार कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत का रियल एस्टेट सेक्टर एक नई मुसीबत में घिरता दिख रहा है। सप्लाई चेन में रुकावट, लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत और निर्माण सामग्री के महंगे होने से देशभर में 2026 में डिलीवर होने वाले करीब 5.40 लाख घरों की समय पर चाबी मिलना मुश्किल हो सकता है।

मुंबई, पुणे और बेंगलुरु पर सबसे ज्यादा खतरा

रियल एस्टेट कंसल्टेंसी एनरॉक (ANAROCK) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल टॉप-7 शहरों में रिकॉर्ड 5,40,400 घरों की डिलीवरी होनी है, जो पिछले 10 साल का सबसे बड़ा आंकड़ा है। लेकिन इन पर ग्लोबल हालात का साया है।

कुल डिलीवरी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मुंबई, पुणे और बेंगलुरु में है, इसलिए सप्लाई चेन में किसी भी दिक्कत का सीधा असर इन्हीं बाजारों पर पड़ेगा। आंकड़ों पर गौर करें तो मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में 2.07 लाख, पुणे में 1 लाख, बेंगलुरु में 69 हजार, हैदराबाद में 63,700, दिल्ली-एनसीआर में 39,000, चेन्नई में 35,600 और कोलकाता में 22,500 घरों की डिलीवरी होनी है।

कोरोना से अलग है इस बार का संकट

एनरॉक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और रिसर्च हेड डॉ. प्रशांत ठाकुर कहते हैं कि बाहरी संकट हमेशा से डिलीवरी को प्रभावित करते रहे हैं। उन्होंने साल 2020 की याद दिलाई, जब कोरोना और लॉकडाउन के कारण लक्ष्य का महज 46 फीसदी काम ही पूरा हो पाया था।

हालांकि, इस बार निर्माण कार्य नहीं रुका है और मजदूर भी उपलब्ध हैं, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव ने प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ा दी है। स्टील, एल्युमिनियम, कॉपर और अन्य निर्माण सामग्री के दाम बढ़ने से डेवलपर्स का मुनाफा और लागत दोनों दबाव में हैं।

पिछले एक दशक में हाउसिंग डिलीवरी का आंकड़ा लगातार बढ़ा है। साल 2017 में 2.04 लाख घर डिलीवर हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 5.19 लाख तक पहुंच गए। अब 2026 में 5.40 लाख घरों का लक्ष्य है। रेरा (RERA) के कड़े नियमों के कारण डेवलपर्स पर समय पर काम पूरा करने का दबाव पहले से कहीं ज्यादा है।

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