कौड़ी से पॉलिमर नोट तक... जानिए भारतीय करेंसी का पूरा इतिहास, 2027 में फिर बदलने वाली है जेब की तस्वीर

भारतीय करेंसी का इतिहास हजारों साल पुराना है। अनाज और कौड़ियों से शुरू हुआ यह सफर शेरशाह सूरी के 'रुपया', ब्रिटिश दौर के नोट, महात्मा गांधी सीरीज, डिजिटल ई-रुपया और अब RBI के पॉलिमर नोटों तक पहुंच चुका है। जानिए भारतीय मुद्रा के अतीत, वर्तमान और भविष्य की पूरी कहानी।

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In Short

  • RBI ने ₹10 और ₹20 के नए पॉलिमर नोटों का ट्रायल शुरू करने की तैयारी की है, जो कागजी नोटों से ज्यादा टिकाऊ और सुरक्षित होंगे।
  • भारतीय करेंसी का सफर वैदिक काल के अनाज और कौड़ियों से शुरू होकर शेरशाह सूरी के 'रुपया', कागजी नोट, डिजिटल ई-रुपया और अब पॉलिमर नोट तक पहुंच चुका है।
  • अगर फील्ड ट्रायल सफल रहा तो 2027 तक पॉलिमर नोट आम चलन में आ सकते हैं, जिससे भारत की करेंसी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

By Franklin Nigam:

Indian currency history: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की करेंसी शाखा ने हाल ही में स्पेशल पॉलिमर शीट की खरीद के लिए टेंडर जारी किया है, जिसके जरिए ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों का ट्रायल शुरू करने की तैयारी है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो भारतीय करेंसी के इतिहास में एक और बड़ा बदलाव दर्ज होगा। चलिए जानते हैं कि कौड़ी से शुरू होकर सिक्कों, कागज के नोटों और अब पॉलिमर करेंसी तक भारत की मुद्रा का सफर कैसे तय हुआ।

ग्लोबल टेंडर (जुलाई 2026): RBI की करेंसी शाखा ने स्पेशल पॉलिमर शीट का टेंडर जारी किया है, जिससे ₹10 और ₹20 के नोटों का नया ट्रायल शुरू होने जा रहा है।

ज़्यादा टिकाऊ और सुरक्षित: ये नोट 2 से 6 गुना लंबे चलते हैं, पानी या धूल से खराब नहीं होते, इनमें जाली नोट बनाना नामुमकिन होता है।

 

2027 तक आम चलन: अगर 6.8 करोड़ पॉलिमर शीट्स का यह फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो वर्ष 2027 तक ये नोट कागज़ी करेंसी के साथ बाज़ार में आ सकते हैं।

डिजिटल ई-रुपया: आरबीआई (RBI) द्वारा जारी भारत की आधिकारिक डिजिटल करेंसी, जिसे फिजिकल कैश की तरह वॉलेट में बिना बैंक अकाउंट के भी रखा जा सकता है।

₹2000 का नोट: 2016 में नोटबंदी के बाद जारी हुआ यह भारत का सबसे बड़ा कागजी नोट था, जिसे मई 2023 में आरबीआई ने चलन से बाहर कर दिया।

अशोक स्तंभ वाले नोट: स्वतंत्रता के बाद 1949 में जारी पहले ₹1 के नोट पर जॉर्ज षष्ठम् की जगह सारनाथ के 'अशोक स्तंभ' को जगह दी गई।

महात्मा गांधी सीरीज के नोट: 1996 में पहली बार भारतीय रिज़र्व बैंक ने सभी नोटों पर वॉटरमार्क और मुख्य रूप से महात्मा गांधी का चित्र छापना शुरू किया।

₹1 का पहला नोट: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चांदी की भारी किल्लत हो गई थी, इसलिए सिक्कों के बजाय 30 नवंबर 1917 को कागजी ₹1 का नोट जारी करना पड़ा।

जॉर्ज पंचम/षष्ठम् वाले ब्रिटिश नोट: 'पेपर करेंसी एक्ट 1861' के तहत ब्रिटिश सरकार ने भारत में केवल अपने राजा (किंग जॉर्ज) के चित्र वाले नोट छापने का कानून बनाया था।

आना, पाई और दमड़ी के सिक्के: 19वीं सदी से 20वीं सदी के मध्य तक 
उस समय 1 रुपया = 16 आना = 64 पैसा = 192 पाई होता था। प्रसिद्ध मुहावरा "पाई-पाई का हिसाब" इसी 'पाई' करेंसी से बना है।

ईस्ट इंडिया कंपनी का सिक्का: 18वीं-19वीं सदी में अंग्रेजों ने भारत में अपनी कंपनी के बजाय मुगल बादशाहों के नाम पर ही सिक्के ढालकर व्यापार किया था।

शेरशाह सूरी का 'रुपया': 1540 – 1545 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने 178 ग्रेन (लगभग 11.5 ग्राम) चांदी का एक शुद्ध सिक्का चलाया, जिसे पहली बार 'रुपया' कहा गया। यही शब्द आज हमारी करेंसी 'Rupee' बना।

मुगलकालीन 'दाम': अकबर के समय तांबे के सबसे छोटे सिक्के को 'दाम' कहा जाता था। इसी सिक्के से आज का हिंदी मुहावरा "दाम लगाना" शुरू हुआ।

गुप्ता काल के 'दीनार' (सोने के सिक्के): 4वीं – 6ठी सदी ईस्वी के गुप्त काल को भारत का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है; इस दौर में राजाओं की धनुर्धारी और वीणा बजाते हुए तस्वीरें सोने के सिक्कों पर उकेरी जाती थीं।

मौर्यकालीन 'पण' या 'कार्षापण' (पंच-मार्क coins): 6वीं सदी ईसा पूर्व से मौर्य काल तक भारत के सबसे पुराने धातु के सिक्के थे, जिन पर कोई लिखावट नहीं होती थी, बल्कि सूर्य, पेड़ या सांड जैसे चिह्नों को ठप्पा मारकर उकेरा जाता था।

कौड़ी: प्राचीन काल से लेकर 19वीं सदी तक समुद्र से मिलने वाली छोटी कौड़ियाँ सबसे छोटे लेन-देन के लिए इस्तेमाल होती थीं। इसी से "फूटी कौड़ी न देना" या "कौड़ियों के भाव बेचना" जैसी कहावतें बनीं।

अनाज और पशु - Barter System: वैदिक काल और उससे पूर्व जब सिक्के और धातु की करेंसी नहीं थी, तब गाय और अनाज (जैसे जौ और गेहूं) को ही धन और लेनदेन का मुख्य माध्यम माना जाता था।

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