अब सिर्फ भारत में नहीं, दुनिया भर में टैलेंट हायर कर रही भारतीय कंपनियां, 77% बढ़ाएंगी ग्लोबल हायरिंग
भारतीय कंपनियां अब सिर्फ देश में नहीं, बल्कि दुनिया भर में टैलेंट तलाश रही हैं। Deel के सर्वे के मुताबिक 77% कंपनियां अगले 12 से 18 महीनों में ग्लोबल हायरिंग बढ़ाने की तैयारी में हैं। इसकी बड़ी वजह स्पेशलाइज्ड स्किल्स, कस्टमर के करीब रहना और चौबीस घंटे ऑपरेशन चलाना है।

In Short
- 77% भारतीय कंपनियां अगले 12-18 महीनों में ओवरसीज हायरिंग बढ़ाने की तैयारी में
- 89% कंपनियों की पहली पसंद एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग टैलेंट
- 76% कंपनियों ने कम्प्लायंस और एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ को सबसे बड़ी चुनौती बताया
भारतीय कंपनियों का काम करने का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में सस्ता और अच्छा टैलेंट खोजने आती थीं, लेकिन अब भारतीय कंपनियां खुद दूसरे देशों में टीमें बना रही हैं।
इसका मकसद सिर्फ कर्मचारियों की कमी पूरी करना नहीं, बल्कि नए मार्केट में पहुंच बढ़ाना, कस्टमर्स के करीब रहना और चौबीस घंटे ऑपरेशन चलाना है। इसी बदलाव के साथ ग्लोबल हायरिंग बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ कम्प्लायंस, पेरोल और अलग-अलग देशों के नियम संभालने की चुनौती भी बढ़ रही है।
77% कंपनियां बढ़ाने वाली हैं ग्लोबल हायरिंग
ग्लोबल पेरोल और एचआर प्लेटफॉर्म Deel के सर्वे में भारत के सात बड़े शहरों के 1,008 सीनियर बिजनेस और एचआर डिसीजन मेकर्स शामिल हुए। इसमें 77% भारतीय कंपनियों ने कहा कि वे अगले 12 से 18 महीनों में विदेशों में हायरिंग बढ़ाने की योजना बना रही हैं। वहीं 54% कंपनियों के एक चौथाई से ज्यादा कर्मचारी पहले ही भारत के बाहर काम कर रहे हैं। 58% कंपनियां चार या उससे ज्यादा देशों में काम कर रही हैं, जबकि करीब हर पांच में से एक कंपनी की मौजूदगी 10 से ज्यादा देशों में है।
स्पेशलाइज्ड टैलेंट और कस्टमर तक पहुंच सबसे बड़ी वजह
सर्वे में 34% कंपनियों ने स्पेशलाइज्ड या नई स्किल वाले टैलेंट तक पहुंच को विदेश में हायरिंग की सबसे बड़ी वजह बताया। 33% कंपनियां कस्टमर्स और लोकल मार्केट के करीब रहने के लिए ग्लोबल हायरिंग कर रही हैं, जबकि 20% का मकसद चौबीस घंटे ऑपरेशन चलाना है। ग्लोबल हायरिंग करने वाली 89% कंपनियां एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग टैलेंट खोज रही हैं। इसके बाद सेल्स और बिजनेस डेवलपमेंट 80% और प्रोडक्ट तथा डिजाइन 45% पर हैं।
नॉर्थ अमेरिका बना सबसे बड़ा हायरिंग मार्केट
भारतीय कंपनियों के लिए नॉर्थ अमेरिका 36% के साथ सबसे पसंदीदा ग्लोबल हायरिंग डेस्टिनेशन है। इसके बाद यूरोप और यूके 27% तथा एशिया पैसिफिक यानी एपीएसी 21% पर है। Deel इंडिया के हेड ऑफ सेल्स राकेश गौर के मुताबिक टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग में कोर डेवलपर्स, एआई-एमएल स्पेशलिस्ट और आरएंडडी टैलेंट की मांग सबसे ज्यादा है।
खर्च नहीं, कम्प्लायंस बनी सबसे बड़ी परेशानी
विदेश में कर्मचारी ढूंढने से ज्यादा मुश्किल उन्हें नियमों के मुताबिक मैनेज करना हो रहा है। 76% कंपनियों ने कम्प्लायंस और एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ को ग्लोबल एक्सपैंशन की सबसे बड़ी चुनौती बताया। कंपनियों को लोकल पेरोल, टैक्स कानून, स्टैच्यूटरी बेनेफिट्स, एम्प्लॉयमेंट रूल्स और डेटा प्राइवेसी जैसे नियम संभालने पड़ते हैं। 36% कंपनियों ने कम्प्लायंस की वजह से मध्यम या बड़ा डिसरप्शन होने की बात कही।
कम्प्लायंस में देरी से लॉन्च और रेवेन्यू पर असर
42% कंपनियों के लिए लोकल एंटिटी सेटअप में देरी सबसे बड़ी समस्या रही। वीजा और वर्क परमिट में देरी 31%, पेरोल या टैक्स फाइलिंग की गलतियां 27% और इंटरनल सिस्टम की कमी 25% कंपनियों के लिए परेशानी बनी। 70% कंपनियों ने कहा कि इन देरी की वजह से प्रोडक्ट या मार्केट लॉन्च पीछे गया। 59% का रेवेन्यू प्रभावित हुआ और 49% को डील, कॉन्ट्रैक्ट या प्रोजेक्ट में नुकसान या देरी झेलनी पड़ी।
कई कंपनियां अब भी मैनुअल तरीके पर निर्भर
46% कंपनियों के पास सेंट्रल एचआर सिस्टम है, लेकिन वे ग्लोबल पेरोल अब भी मैनुअली संभाल रही हैं। वहीं 44% कंपनियां इंटरनेशनल टीमों को मैनेज करने के लिए दो से पांच अलग-अलग एचआर या वर्कफोर्स प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करती हैं।
EOR मॉडल का इस्तेमाल भी बढ़ा
34% कंपनियां पहले से एम्प्लॉयर ऑफ रिकॉर्ड यानी ईओआर मॉडल का इस्तेमाल कर रही हैं। वहीं 24% कंपनियां ईओआर, कॉन्ट्रैक्टर्स और अपनी लोकल एंटिटीज का मिला-जुला मॉडल अपनाती हैं। ईओआर इस्तेमाल करने वाली 40% कंपनियों का कहना है कि इससे समय और खर्च दोनों बचते हैं, जबकि 35% के मुताबिक इसका सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है।