अब विमानों में इस्तेमाल होगा खास तरह का ईंधन, सरकार ने तैयार किया नया प्लान
भारत में हवाई सफर के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन को लेकर सरकार नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एक ड्राफ्ट पॉलिसी बनाई है, जिसमें एयरलाइंस के लिए नए नियम और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रस्ताव शामिल हैं। जानिए इससे क्या कुछ बदलने वाला है।

In Short
- सरकार ने सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल को लेकर नई ड्राफ्ट पॉलिसी तैयार की है।
- साल 2027 से विमान के ईंधन में 1 फीसदी SAF मिलाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
- साल 2040 तक SAF की हिस्सेदारी 40 फीसदी करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की योजना है।
भारत में हवाई सफर के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन को लेकर सरकार बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) को लेकर एक ड्राफ्ट पॉलिसी तैयार की है। इसके तहत 2027 से विमान के ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल में SAF मिलाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। शुरुआत में इसकी मात्रा 1 फीसदी होगी, जिसे आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा।
PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रालय ने नेशनल पॉलिसी ऑन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल का ड्राफ्ट जारी किया है। इसमें केवल भारत में तैयार SAF को ही विमान के ईंधन में मिलाने का प्रस्ताव रखा गया है।
2027 से शुरू होगा नया नियम
ड्राफ्ट पॉलिसी के मुताबिक, SAF की अनिवार्य ब्लेंडिंग दो चरणों में लागू करने की योजना है। पहला चरण 2027 से 2030 तक चलेगा। इस दौरान ईंधन में SAF की हिस्सेदारी 1 फीसदी से बढ़ाकर 5 फीसदी की जाएगी।
दूसरा चरण 2031 से 2040 तक होगा। इस दौरान SAF की हिस्सेदारी बढ़ाकर 40 फीसदी तक पहुंचाने का प्रस्ताव है।
विदेशी उड़ानों के लिए भी खास नियम
सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने वाली भारतीय और विदेशी एयरलाइंस के लिए भी नियम प्रस्तावित किया है। इसके तहत एयरलाइंस को अपनी सालाना अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की निर्धारित ईंधन जरूरत का कम से कम 90 फीसदी भारत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से लेना होगा।
इसका मकसद 'इकोनॉमिक टैंकरिंग' को रोकना है। इसका मतलब है कि एयरलाइंस ईंधन की कीमतों में अंतर के कारण किसी एयरपोर्ट से जरूरत से ज्यादा ईंधन भर लेती हैं।
SAF बनाने वाली कंपनियों को मिलेगी मदद
सरकार देश में SAF उत्पादन बढ़ाने के लिए कई तरह की आर्थिक मदद देने पर विचार कर रही है। इनमें GST में छूट या कमी, आयात शुल्क में राहत, इनकम टैक्स में छूट और तेज डेप्रिसिएशन जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।
इसके अलावा ग्रीन फाइनेंसिंग, उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए वित्तीय सहायता और रिफाइनरियों को अपग्रेड करने में मदद देने की भी योजना है।
सरकार एक अलग SAF Innovation Seed Fund बनाने की तैयारी में है, जिससे नई तकनीक, पायलट प्रोजेक्ट और स्टार्टअप्स को सहायता मिल सकेगी।
2040 तक 10 मिलियन टन उत्पादन की क्षमता
ड्राफ्ट के अनुमान के मुताबिक, भारत में ATF की सालाना खपत मौजूदा 82 लाख टन से बढ़कर 2030 तक करीब 1.42 करोड़ टन पहुंच सकती है।
वहीं, 2040 तक देश में सालाना करीब 1 करोड़ टन SAF बनाने की क्षमता विकसित हो सकती है। इसके लिए 70 से 85 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी।
SAF बनाने में कृषि अवशेष, इस्तेमाल किया हुआ खाना पकाने का तेल, शहरों का ठोस कचरा और औद्योगिक कचरा इस्तेमाल किया जा सकता है।
पॉलिसी को लागू करने के लिए नेशनल काउंसिल ऑन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल बनाने का भी प्रस्ताव है। साथ ही DGCA के तहत एक डिजिटल SAF रजिस्ट्री बनाई जाएगी, जिसमें SAF से जुड़े लेनदेन का रिकॉर्ड और सत्यापन किया जाएगा।