अमेरिका और चीन दोनों से भारत को क्यों कम करनी होगी निर्भरता? संजय बारू ने बताया क्या है सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिका और चीन के साथ भारत के रिश्तों को लेकर संजय बारू ने अहम बात कही है। उन्होंने बताया कि बदलते वैश्विक हालात में भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। आखिर दोनों देशों पर निर्भरता कम करना क्यों जरूरी है और भारत के लिए ऐसा करना कितना मुश्किल होगा? जानिए।

In Short
- संजय बारू ने कहा कि भारत को अमेरिका और चीन दोनों पर अपनी निर्भरता से जुड़े जोखिम कम करने होंगे।
- अमेरिका भारतीय सामान और सेवाओं के निर्यात के लिए बड़ा बाजार है, इसलिए उससे आर्थिक रिश्ते खत्म करना आसान नहीं है।
- बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत के सामने दोनों बड़ी शक्तियों के साथ अपने संबंध संभालने की चुनौती है।
दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भरता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच फोरम फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज और सेंटर फॉर एयरोस्पेस एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के चेयरमैन संजय बारू ने कहा है कि भारत को अमेरिका और चीन दोनों पर अपनी निर्भरता से जुड़े जोखिम कम करने होंगे।
द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में बारू ने कहा कि भारत को इतिहास से सीख लेते हुए अपनी विदेश नीति और आर्थिक संबंधों में बदलाव करने की जरूरत है।
अमेरिका पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करना मुश्किल
संजय बारू ने कहा कि कई जानकार भारतीय विदेश नीति में अमेरिका पर निर्भरता कम करने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि, ऐसा पूरी तरह करना संभव नहीं है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका भारतीय सामान और सेवाओं के निर्यात के लिए एक बड़ा बाजार है।
दोनों देशों के लोगों और कारोबारियों के बीच भी मजबूत संबंध हैं। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में अमेरिका भारत का अहम साझेदार है। हालांकि, इस क्षेत्र में भारत के पास अब पहले से ज्यादा विकल्प मौजूद हैं।
बारू के मुताबिक, ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों में भरोसा खत्म हो गया है। ऐसे में भारत अमेरिका पर अपनी रणनीतिक निर्भरता खत्म कर सकता है। हालांकि, भरोसा नहीं होने के बावजूद आर्थिक रिश्ते जारी रह सकते हैं। अमेरिका और चीन इसके उदाहरण हैं।
अमेरिकी टैरिफ के खतरे के बीच बढ़ी चिंता
बारू की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारतीय सामान पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी कांग्रेस ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 के पक्ष में भारी मतदान किया है।
हालांकि, भारत भी इन परिस्थितियों से पूरी तरह अनजान नहीं है। ब्रिक्स समिट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी इसका उदाहरण है।
अमेरिका और चीन दोनों से जोखिम कम करना जरूरी
बारू ने लिखा कि अमेरिका चीन पर अपनी निर्भरता से जुड़े जोखिम कम करने और दूसरे विकल्प तलाशने की बात करता रहा है। हालांकि, वह चीन से आर्थिक रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहता।
भारत भी रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और मैनपावर के क्षेत्र में अपनी बाहरी निर्भरता से जुड़े जोखिम कम करने की कोशिश कर रहा है। पिछले एक साल में भारत की रणनीति अमेरिका पर निर्भरता कम करने की रही है।
बारू के मुताबिक, भारत को अमेरिका और चीन दोनों से जुड़े जोखिम कम करने होंगे, लेकिन दोनों देशों से पूरी तरह अलग होना संभव नहीं है।
बदलती दुनिया में भारत के सामने दोहरी चुनौती
बारू ने कहा कि भारत को एक तरफ कमजोर होती शक्ति और दूसरी तरफ उभरती शक्ति के साथ संबंध संभालने होंगे।
उन्होंने लिखा कि अमेरिका अपनी सैन्य, तकनीकी और आर्थिक ताकत बनाए रखने की कोशिश करता रहेगा। वहीं चीन, रूस, भारत और दूसरे देश भी अपने हितों की रक्षा करेंगे। ऐसे में कई देश अमेरिका पर निर्भरता कम करने की कोशिश करेंगे, जबकि भारत जैसे देशों को चीन से भी जुड़े जोखिम कम करने होंगे।