दुनिया में बढ़ रही रिफाइनिंग कैपेसिटी! इंडिया और चाइना क्यों बनेंगे सबसे अहम प्लेयर
दुनिया के फ्यूल मार्केट में बड़ा बदलाव आने वाला है। अगले पांच साल में ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी तेजी से बढ़ सकती है और इसमें एशिया और अफ्रीका की बड़ी भूमिका रहने की उम्मीद है। खास बात यह है कि इंडिया और चाइना नई कैपेसिटी जोड़ने में सबसे आगे रह सकते हैं। जानिए ग्लोबल रिफाइनिंग मार्केट में इंडिया कहां खड़ा है।

In Short
- ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी में इंडिया की हिस्सेदारी 4.7% है।
- 2026-27 की नई कैपेसिटी में इंडिया और चाइना की हिस्सेदारी 71% रह सकती है।
- - 2026 से 2030 तक रोजाना 4.2 मिलियन बैरल नई कैपेसिटी जुड़ सकती है।
दुनिया में फ्यूल मार्केट की सुरक्षा के लिए ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी काफी अहम होती जा रही है। अगले पांच साल में दुनिया की रिफाइनिंग कैपेसिटी में बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। नए रिफाइनरी प्रोजेक्ट्स का बड़ा हिस्सा एशिया और अफ्रीका में आने वाला है। इससे आने वाले समय में अलग-अलग देशों के बीच फ्यूल की खरीद-बिक्री का तरीका बदल सकता है।
चाइना और यूएस के पास सबसे ज्यादा रिफाइनिंग कैपेसिटी
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की कुल रिफाइनिंग कैपेसिटी में चीन की हिस्सेदारी 18.1% है। इसके बाद यूनाइटेड स्टेट्स की हिस्सेदारी 17.5% और रूस की 6.5% है।
इन तीनों देशों की कुल हिस्सेदारी 42.1% है। यानी दुनिया की रिफाइनिंग कैपेसिटी का बड़ा हिस्सा इन तीन देशों के पास है।
रिफाइनिंग कैपेसिटी का मतलब है कि कोई देश कितने क्रूड ऑयल को पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसे तैयार पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में बदल सकता है। इसलिए रिफाइनरी के कामकाज, घरेलू मांग या एक्सपोर्ट पॉलिसी में बदलाव का असर ग्लोबल फ्यूल मार्केट पर पड़ सकता है।
फ्यूल एक्सपोर्ट को लेकर क्या हुआ?
हाल के बदलावों ने रिफाइनिंग कैपेसिटी की अहमियत और बढ़ा दी है। यूएस ने डीजल एक्सपोर्ट पर रोक लगाने पर विचार किया था। इसमें 90 दिनों के लिए पूरी तरह रोक लगाने का प्रस्ताव भी था, लेकिन बाद में इस प्रस्ताव को छोड़ दिया गया।
चाइना ने अक्टूबर के लिए फ्यूल एक्सपोर्ट रोक दिया। वहीं पेट्रोचाइना ने पेट्रोल और जेट फ्यूल के कार्गो रद्द कर दिए। रूस ने भी डीजल एक्सपोर्ट पर लगी रोक को आगे बढ़ाया है।
2030 तक कितनी बढ़ेगी ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी?
ब्लूमबर्गएनईएफ यानी BNEF के मुताबिक 2026 से 2030 के बीच दुनिया की नेट रिफाइनिंग कैपेसिटी में रोजाना 4.2 मिलियन बैरल की बढ़ोतरी हो सकती है।
यह पिछले पांच साल में जुड़ी कैपेसिटी के मुकाबले 162% ज्यादा है। अगर सभी प्रोजेक्ट्स तय योजना के मुताबिक शुरू होते हैं तो कुछ मार्केट्स में जरूरत से ज्यादा रिफाइनिंग कैपेसिटी भी हो सकती है।
इंडिया और चाइना की होगी बड़ी भूमिका
अफ्रीका और एशिया पैसिफिक दुनिया में होने वाली नेट रिफाइनिंग कैपेसिटी ग्रोथ का करीब 95% हिस्सा दे सकते हैं।
BNEF के मुताबिक 2026 और 2027 में जुड़ने वाली नई रिफाइनिंग कैपेसिटी में इंडिया और चाइना की संयुक्त हिस्सेदारी 71% रहने की उम्मीद है। इसमें से ज्यादातर कैपेसिटी या तो शुरू हो चुकी है या उस पर काम चल रहा है।
फिलहाल ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी में इंडिया की हिस्सेदारी 4.7% है। इंडिया इस मामले में दुनिया में चौथे स्थान पर है। उससे आगे चाइना, यूनाइटेड स्टेट्स और रूस हैं।
साउथ कोरिया की हिस्सेदारी 3.4% और सऊदी अरब की 3.2% है।
यूरोप में अलग है स्थिति
ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी में यूरोप के कई देशों की हिस्सेदारी कम है। जर्मनी की हिस्सेदारी 1.9%, इटली की 1.6% और स्पेन की 1.5% है।
अगर इन देशों में रिफाइनरी कैपेसिटी कम पड़ती है या किसी रिफाइनरी का काम रुकता है तो इम्पोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता बढ़ सकती है। BNEF के मुताबिक यूरोप और यूएस में आने वाले समय में कुछ रिफाइनरियां बंद भी हो सकती हैं।
वहीं 2028 से 2030 के बीच आने वाले कई रिफाइनरी प्रोजेक्ट्स अभी शुरुआती चरण में हैं। इसलिए इनमें देरी होने या कुछ प्रोजेक्ट्स के रद्द होने की संभावना भी है।
आने वाले सालों में एक तरफ एशिया और अफ्रीका में रिफाइनिंग कैपेसिटी बढ़ सकती है, जबकि यूरोप और यूएस जैसे पुराने मार्केट्स में कुछ रिफाइनरियां बंद हो सकती हैं। इससे ग्लोबल फ्यूल सप्लाई और फ्यूल इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का मौजूदा समीकरण बदल सकता है।