त्योहारों से पहले बढ़ सकता है ‘महंगाई डायन’ का कहर, विदेश मंत्री से कृषि मंत्री तक ने किया आगाह!

त्योहारी सीजन से पहले आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ने की चिंता बढ़ गई है। चना, मूंग, मटर और अरहर जैसी दालों के दाम एक महीने में करीब 10% तक बढ़े हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक फूड क्राइसिस को लेकर चेताया है, जबकि शिवराज सिंह चौहान ने सूखे की स्थिति पर चिंता जताई है।

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In Short

  • दालों के दाम में तेजी प्रमुख दालें एक महीने में करीब 10% तक महंगी हुई हैं
  • फूड क्राइसिस का खतरा एस. जयशंकर ने वैश्विक खाद्य संकट और सप्लाई पर दबाव की चेतावनी दी है
  • मौसम से बढ़ी चिंता अल नीनो और महाराष्ट्र-कर्नाटक में सूखे जैसी स्थिति से रबी फसलों पर असर का खतरा है

By Gaurav Kumar:

भारत में अब त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है। पहले नवरात्रि, फिर दिवाली, उसके बाद छठ और क्रिसमस जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं। त्योहारों के साथ घरों में खरीदारी और खाने-पीने का खर्च भी बढ़ता है। लेकिन इस बार खुशियों के इस मौसम से पहले ही आम आदमी को महंगाई का झटका लग सकता है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आने वाले महीनों में वैश्विक फूड क्राइसिस की चेतावनी दी है, वहीं कृषि सचिव आतिश चंद्र ने अल नीनो के कारण आगामी रबी सीजन को चुनौतीपूर्ण बताया है। इसके अलावा कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे जैसी स्थिति को लेकर चिंता जताई है।

1 महीने में 10% महंगी हुई दालें

चना, मूंग, मटर और अरहर जैसी प्रमुख दालों के दाम पिछले महीने करीब 10% तक बढ़ चुके हैं, जबकि बीते एक हफ्ते में इनमें 3-5% की तेजी आई है। ऐसे में एक बार फिर वही बात याद आ रही है- 'महंगाई डायन खाए जात है।'

दालों की कीमतों में इस तेजी के पीछे मॉनसून के कारण फसल को हुआ नुकसान और त्योहारों के दौरान बढ़ने वाली मांग प्रमुख वजहें हैं।

आने वाले दिनों में नवरात्रि, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के कारण खाने-पीने की चीजों की मांग बढ़ सकती है। अगर इसी दौरान सप्लाई कमजोर रहती है, तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है। दाल रोजमर्रा की रसोई का अहम हिस्सा है। इसलिए इसके दाम बढ़ने का सीधा असर आम परिवार के मासिक राशन बजट पर पड़ता है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दी चेतावनी

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आने वाले महीनों में संभावित फूड क्राइसिस को लेकर चेतावनी दी है। यूक्रेन और ईरान-खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्षों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन घटनाक्रमों से ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर दबाव पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रमुख अनाज निर्यातक देशों से होने वाली सप्लाई में व्यवधान, खासकर ब्लैक सी के जरिए अनाज की ढुलाई में परेशानी, खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

इसके अलावा फर्टिलाइजर की सप्लाई पर दबाव भी चिंता का विषय है। अगर दुनिया के बड़े उत्पादक क्षेत्रों से खाद की सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका असर खेती की लागत और आगे चलकर खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।

PMO के प्रधान सचिव, पीके मिश्रा ने कहा कि भारत को अपनी मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति और स्थिर आर्थिक विकास को लेकर संतुष्ट होकर नहीं बैठना चाहिए। दुनिया में तेजी से बदल रहे घटनाक्रमों से कई तरह के जोखिम पैदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक गठबंधन अब बिखर रहे हैं, सप्लाई चेन का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जबकि पूंजी का प्रवाह कभी भी रोका या बदला जा सकता है। 

वहीं मुख्य आर्थिक सलाहकार, वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि भारत पर व्यापार और ऊर्जा से जुड़े दबावों के पीछे एक और बड़ा दबाव है। देशों को अलग-अलग वैश्विक गुटों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर किया जाना। उन्होंने कहा कि भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और बड़े आकार के कारण किसी एक गुट का हिस्सा नहीं बन सकता। हालांकि, रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय लेने की इस नीति की अपनी कीमत भी है। भारत को आने वाले वर्षों में इसके लिए तैयार रहना होगा।

तेल, खाद और खाद्य महंगाई का कनेक्शन

महंगाई सिर्फ फसल की पैदावार पर निर्भर नहीं करती। खेती से लेकर बाजार तक पहुंचने के बीच डीजल, कच्चा तेल, खाद, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत भी महत्वपूर्ण होती है।

जयशंकर ने कहा है कि ऊर्जा बाजार पहले ही काफी दबाव में है। तेल सप्लाई में व्यवधान और राजनीतिक तनाव कीमतों को ऊपर धकेल रहे हैं। पश्चिम एशिया और रूस जैसे प्रमुख उर्वरक उत्पादक क्षेत्रों पर भी संकट का असर पड़ने की बात सामने आई है।

अल नीनो ने बढ़ाई रबी सीजन की चिंता

खाद्य महंगाई के मोर्चे पर मौसम भी बड़ा फैक्टर बन गया है। कृषि सचिव आतिश चंद्र ने आगामी रबी सीजन को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अल नीनो मौसम पैटर्न के कारण आने वाला रबी सीजन खासकर बारिश पर निर्भर क्षेत्रों के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकता है।

इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम है। रबी सीजन में गेहूं के अलावा चना, मसूर, मटर, सरसों और कई दूसरी अहम फसलों की खेती होती है। ऐसे में मौसम का असर उत्पादन पर पड़ा तो आने वाले महीनों में खाद्य सप्लाई पर भी दबाव बन सकता है।

हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो से उत्पादन कितना प्रभावित होगा। वास्तविक असर बारिश, सिंचाई, मिट्टी की नमी और किसानों की बुवाई पर निर्भर करेगा।

महाराष्ट्र-कर्नाटक में सूखे की स्थिति

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी रबी सीजन की तैयारियों को लेकर राज्यों को सतर्क रहने को कहा है। उन्होंने महाराष्ट्र और कर्नाटक की स्थिति पर चिंता जताई। उनके मुताबिक, महाराष्ट्र का करीब दो-तिहाई हिस्सा प्रभावित है और राज्य ने सूखा घोषित किया है, जबकि कर्नाटक भी सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है।

केंद्र सरकार की ओर से दोनों राज्यों में जमीनी स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय दल भेजे जा रहे हैं। कर्नाटक में केंद्रीय दल 3 अक्टूबर को जमीनी आकलन करेगा, जबकि महाराष्ट्र में भी केंद्रीय टीम भेजी जाएगी।

त्योहारों में बढ़ेगी मांग, रसोई का बजट कितना बढ़ेगा?

त्योहारों के मौसम में घरों का खर्च सामान्य दिनों के मुकाबले बढ़ जाता है। मिठाई, पूजा सामग्री और खाने-पीने की चीजों से लेकर कपड़े, गिफ्ट और यात्रा तक पर खर्च होता है।

ऐसे में अगर दाल जैसी रोजमर्रा की जरूरी चीजों के दाम पहले से बढ़े हुए हैं और त्योहारों के दौरान मांग और बढ़ती है, तो इसका असर सीधे परिवारों के फेस्टिव बजट पर पड़ सकता है।

हालांकि, यह जरूरी नहीं कि आने वाले महीनों में सभी खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ें। सरकारी हस्तक्षेप, बफर स्टॉक, आयात-निर्यात नीति, घरेलू उत्पादन और मौसम कीमतों की दिशा बदल सकते हैं।

क्या फिर लौट रही है 'महंगाई डायन'?

फिलहाल तस्वीर में कई ऐसे फैक्टर हैं, जिन पर नजर रखना जरूरी है- दालों की कीमतों में तेजी, त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग, मॉनसून का असर, रबी सीजन पर अल नीनो का खतरा, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे की स्थिति और ग्लोबल स्तर पर खाद्य, तेल और उर्वरक सप्लाई पर दबाव।

यानी नवरात्रि से शुरू होने वाले त्योहारों के इस लंबे सीजन में आम आदमी के सामने सिर्फ शॉपिंग और सेल का सवाल नहीं होगा, बल्कि रसोई के बजट का भी हिसाब रखना पड़ेगा।

सरकार कीमतों पर नजर रख रही है और कई जरूरी वस्तुओं के दाम नियंत्रित करने के लिए कदम भी उठा रही है। लेकिन दालों में जारी तेजी और मौसम से जुड़े जोखिमों ने चिंता जरूर बढ़ा दी है।

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