El Niño 2026: कोयले की रिकॉर्ड सप्लाई फिर भी बिजलीघरों में स्टॉक कम! आखिर क्यों बढ़ रही भारत की मुश्किल?

भारत में इस साल कम बारिश ने बिजली उत्पादन का पूरा गणित बदल दिया है। हाइड्रोपावर में गिरावट के बीच थर्मल पावर प्लांट पर दबाव बढ़ गया है। रेलवे रिकॉर्ड मात्रा में कोयला पहुंचा रहा है, फिर भी कई बिजलीघरों में स्टॉक बेहद कम है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और बढ़ती बिजली की मांग कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है? जानिए।

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जून से अक्टूबर के बीच हाइड्रोपावर उत्पादन 16% घटा, जिसकी पूरी भरपाई थर्मल पावर प्लांट ने की।
जून से अक्टूबर के बीच हाइड्रोपावर उत्पादन 16% घटा, जिसकी पूरी भरपाई थर्मल पावर प्लांट ने की।

In Short

  • मानसून में 15% कम बारिश से हाइड्रोपावर उत्पादन 16% घटा, थर्मल प्लांट ने की कमी पूरी।
  • अक्टूबर में कोयले की रेलवे ढुलाई 22% से ज्यादा बढ़ी, फिर भी कई बिजलीघरों में स्टॉक बेहद कम।
  • सितंबर में बिना सोलर उत्पादन वाले घंटों के दौरान बिजली की बाजार कीमतों में 71% की बढ़ोतरी।

By Shakshi:

अल नीनो (El Niño) का असर इस साल भारत के बिजली सेक्टर पर साफ दिखाई दे रहा है। मानसून में सामान्य से कम बारिश होने के कारण पानी से बनने वाली बिजली यानी हाइड्रोपावर का उत्पादन घट गया। इसकी कमी पूरी करने के लिए कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांट को ज्यादा बिजली बनानी पड़ी। हैरानी की बात यह है कि कोयले की रिकॉर्ड सप्लाई के बावजूद कई बिजलीघरों में इसका स्टॉक बेहद कम हो गया है।

कम बारिश से हाइड्रोपावर उत्पादन में गिरावट

जून से अक्टूबर के बीच आमतौर पर हाइड्रोपावर का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। लेकिन इस साल इसमें 16% की गिरावट दर्ज की गई। इसकी भरपाई के लिए थर्मल पावर प्लांट ने 16% ज्यादा बिजली बनाई।

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून 15 अक्टूबर को समाप्त हुआ और इस दौरान सामान्य से 15% कम बारिश हुई। महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में बारिश की कमी ज्यादा रही।

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले के निकित अभ्यंकर के मुताबिक, 2026 में सोलर बिजली उत्पादन 39% बढ़ा, जबकि कोयले से बनने वाली बिजली में भी 8% की बढ़ोतरी हुई। इससे पता चलता है कि बिजली की लगातार सप्लाई बनाए रखने के लिए थर्मल पावर प्लांट अभी भी बेहद जरूरी हैं।

बिजली की कीमतों में क्यों आया उछाल?

सितंबर और अक्टूबर में बिजली की मांग बढ़ने से थर्मल प्लांट पर दबाव बढ़ा। खासकर उन घंटों में जब सोलर पैनल से बिजली नहीं बनती, कोयले से बनने वाली बिजली की जरूरत ज्यादा रही।

सितंबर में इन घंटों के दौरान बिजली की बाजार कीमतें पिछले साल के मुकाबले 71% बढ़ गईं। वहीं थर्मल बिजली उत्पादन की अनुमानित परिवर्तनीय लागत में सिर्फ 4.4% की बढ़ोतरी हुई।

रिकॉर्ड सप्लाई के बाद भी कोयले की कमी

भारतीय रेलवे ने अक्टूबर में अब तक कोयले की ढुलाई में पिछले साल के मुकाबले 22% से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की है। रेलवे के मुताबिक, रोजाना औसतन 87 अतिरिक्त रेक कोयला पहुंचाया गया।

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में रेलवे ने रोजाना औसतन 430 कोयला रेक थर्मल प्लांट तक पहुंचाए। यह पिछले साल से 7.1% ज्यादा है। इसके बावजूद बिजली उत्पादन बढ़ने के कारण कई प्लांट में कोयले का स्टॉक कम बना हुआ है।

घरों में बढ़ती बिजली की खपत भी चुनौती

देश की कुल बिजली खपत में घरों की हिस्सेदारी करीब 25% है। पिछले एक दशक में घरेलू बिजली खपत 256 TWh से बढ़कर 409 TWh पहुंच गई है।

BEE और CLASP की रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती आमदनी और शहरीकरण से एसी, फ्रिज और दूसरे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ेगा। ऐसे में बिजली की मांग नियंत्रित रखने के लिए ज्यादा ऊर्जा-कुशल उपकरणों और सख्त दक्षता मानकों की जरूरत होगी।

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