₹2,700 की कैंसर दवा का ₹27,000 MRP! सुप्रीम कोर्ट भी चौंका, कॉरपोरेट अस्पतालों पर उठे सवाल

कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक दवा की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। रिटेलर तक कम कीमत में पहुंचने वाली दवा का MRP कई गुना ज्यादा होने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। आखिर इतनी बड़ी कीमत का फायदा किसे मिल रहा है और सरकार क्या करेगी?

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In Short

  • ₹2,700 में रिटेलर तक पहुंचने वाली कैंसर की दवा का MRP ₹27,000 होने पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल।
  • कोर्ट ने सभी दवाओं पर एक समान 16% मार्जिन रखने का सुझाव दिया और अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था पर सवाल उठाए।
  • केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए समय मिला, मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

By Gungun Mishra:

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में महंगी दवाओं का बोझ उठाने वाले मरीजों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी चिंता जताई है। कोर्ट के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें रिटेलर को ₹2,700 में मिलने वाली कैंसर की दवा का MRP ₹27,000 था। दवा की कीमत में 10 गुना अंतर देखकर सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'खुली लूट' जैसा बताया और सवाल किया कि आखिर इतना पैसा किसकी जेब में जा रहा है?

दवाओं की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि जब दवा रिटेलर तक ₹2,700 में पहुंच रही है, तो उसका MRP ₹27,000 क्यों है? आखिर इस भारी अंतर का फायदा किसे मिल रहा है?

कोर्ट ने कहा कि इसका सीधा असर आम मरीजों पर पड़ता है। खासकर उन लोगों पर, जो महंगा इलाज कराने के लिए पहले से ही परेशान हैं।

सभी दवाओं पर 16% मार्जिन रखने का सुझाव

सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि जरूरी और गैर-जरूरी दवाओं पर अलग-अलग मार्जिन क्यों होना चाहिए? उन्होंने सभी दवाओं पर एक समान 16% मार्जिन रखने का सुझाव दिया।

कोर्ट ने कहा कि सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों की दवाओं का खर्च आखिरकार टैक्सपेयर्स के पैसे से चुकाया जाता है। ऐसे में दवाओं की ज्यादा कीमत का बोझ आम जनता पर पड़ता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदना क्यों जरूरी?

सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट अस्पतालों के उस तरीके पर भी सवाल उठाए, जिसमें मरीजों को अस्पताल की अपनी फार्मेसी या तय मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है।

कोर्ट ने कहा कि अगर वही दवा बाहर कम कीमत पर मिल रही है, तो मरीज को महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर क्यों किया जाए? कोर्ट ने सरकार से इस मामले की जांच करने को कहा।

12 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार को अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए दो हफ्ते चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दवाओं की बढ़ी हुई कीमतों का फायदा जरूरी नहीं कि फार्मा कंपनियों को ही मिल रहा हो।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर तय की है। कोर्ट दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण, जेनेरिक दवाएं लिखने और मेडिकल उपकरणों की कीमतों से जुड़ी दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें दवाओं की ज्यादा कीमत वसूलने और जेनेरिक दवाएं नहीं लिखने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी शामिल है।

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